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आखिर कब तक धैर्य दिखायेगा भारत और खामोश रहेंगे उसके मजबूत दोस्त

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आलेख: कमलेश पांडे, वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार। भारत के प्रति चीन की बढ़ती आक्रामकता अनायास नहीं है, बल्कि एशिया में अपने राजनैतिक व कूटनीतिक दबदबे के लिये वह भारत के खिलाफ किसी भी हद तक जा सकता है। 1962 का भारत-चीन युद्ध इसका सबसे बड़ा गवाह है। इसलिये भारतीय सीमा पर चीन की जो समसामयिक सामरिक तैयारियां चल रही हैं, भारत को उसे हल्के में कतई नहीं लेना चाहिए। इस बात में कोई दो राय नहीं कि चीन की हर सोची समझी सामरिक चालों और आक्रामक कार्रवाइयों का दो टूक जवाब, भारत भी अपनी समझदारी भरी और रणनीतिक तरीके से दे रहा है जिससे न केवल उसकी खीझ बढ़ी है, बल्कि सीमाओं पर दोनों देशों का टकराव भी बढ़ा है।

यही वजह है कि भारत को अब 1962 की असावधानियों से सबक लेते हुए ‘काउंटर वार’ के मद्देनजऱ जारी अपनी युद्ध सम्बन्धी तैयारियों की गति को और तेज कर देना चाहिए। साथ ही युद्ध कूटनीति का परिचय देते हुए और अपने मजबूत दोस्तों को पूरे भरोसे में लेकर सार्क, आसियान, पूर्वी एशिया और अरब देशों में उसकी हर चाल का मुंहतोड़ जवाब देना चाहिए, ताकि वह हरेक जगह उलझ जाए। इससे हमारी सीमाओं पर उसकी नीयत भी बदलेगी और क्षुद्र रणनीति भी, क्योंकि युद्ध कूटनीति का यही सबसे बड़ा तकाजा होता है, जिसमें न जाने क्यों भारतीय नेतृत्व अब तक चूकता प्रतीत हो रहा है?

यही नहीं, ब्रिक्स समेत दुनिया के हर उस संगठन से भारत को बाहर निकल जाना चाहिए, जहाँ चीन की तूती बोलती हो। इससे दुनिया के शेष देश भी सबक लेने को बाध्य हो जाएंगे और लुक-छिप कर शह-मात का खेल नहीं खेल पाएंगे। यह सही है कि  कभी गुटनिरपेक्षता और पंचशील के सिद्धांतों से प्रेरित हो ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ के नारे लगाने वाला उदारमना भारत, भले ही 1962 के भारत-चीन युद्ध से मिले घाव को भूल जाने को उत्सुक रहा हो, लेकिन भारत के प्रति ड्रैगन की पहचान रखने वाले चीन की जो कुटिल चाल और क्षुद्र रणनीति है, साम्राज्यवादी और विस्तारवादी सोच है, अपने मजबूत प्रतिस्पर्द्धियों को अपने सामने झुकाये रखने की जो फितरत है, वह दोनों देशों के द्विपक्षीय मधुर सम्बन्धों में सदैव बाधक रही है। इसलिये अब आर या पार की रणनीति अपनाकर ही भारत अपने क्षेत्रीय और वैश्विक हितों की रक्षा कर सकता है, अन्यथा कतई नहीं।

खास कर भारत और उसके पड़ोसी देशों-यथा पाकिस्तान, श्रीलंका, मालदीव, नेपाल, भूटान, बंग्लादेश, म्यांमार आदि के प्रति चीन की जो क्षुद्रता भरी और भारत विरोधी कुटिल रणनीति है, उससे भारत और चीन के बीच अविश्वास निरन्तर बढ़ता ही जा रहा है। यही नहीं, दुनिया के रंगमंच पर जिस तरह से पाकिस्तान की नारायज हरकतों को वह शह दे रहा है, उसने आग में घी का काम किया है। गौर करने वाली बात यह है कि भारत-अमेरिका-जापान-दक्षिण कोरिया के मजबूत आपसी सम्बन्धों के बावजूद चीन जिस तरह का दुस्साहस प्रदर्शित कर रहा है, उससे भारतीय नेतृत्व को सावधान हो जाना चाहिए।

हैरत की बात है कि सम्बन्धित सभी पक्षों द्वारा अपनी अपनी सीमा में युद्ध सम्बन्धी तैयारियां तेज की जा चुकी हैं। इसके मद्देनजर चले जा रहे कूटनीतिक दांवपेंचों से भी स्पष्ट है कि थोड़ी सी भी आपसी गलतफहमियों, या फिर रणनीतिक चूक से पूरा एशिया झुलस सकता है और इसकी जांच से पूरी दुनिया ऐसी तपेगी कि किसी तीसरे विश्व युद्ध की नौबत भी आ सकती है। निःसंदेह भारत और चीन के बीच एक अरसे से चल रहा शीत युद्ध कब असली युद्ध (आपसी टकराव) में बदल जायेगा, इस बारे में निश्चित तौर पर कुछ भी अनुमान लगाना कठिन है। क्योंकि चीनी नेतृत्व ‘मुंह में राम, बगल में छुरी’ वाली कहावत को चरितार्थ कर रहा है।

दरअसल, भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) तिब्बती पठार समेत 3,488 किलोमीटर तक फैला हुआ है। इसलिये चीन और भारत दोनों के लिये अपने अपने पर्वतीय वायु क्षेत्र की सुरक्षा सबसे अहम मुद्दा है। एक तरफ भारत जो कि तीसरी पीढ़ी के युद्धक विमान से लैस है और अपनी सुरक्षा जरूरतों को पूरा करने के लिए फ्रांस से राफेल विमानों का सौदा कर चुका है, तो दूसरी तरफ चीन भी सीमा पर 3.5 पीढ़ी के जेट विमानों की तैनाती कर रहा है ताकि युद्ध की किसी भी परिस्थिति में भारत को कड़ी टक्कर दे सके।

युद्ध करने के नजरिये से ही वह भारत से लगी अपनी सीमा पर अपने पश्चिमी कमांड के तहत कड़ी हवाई घेरा बन्दी भी कर रहा है। चीनी सैन्य विशेषज्ञ भले ही यह दलील दें रहे हैं कि वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर भारत से किसी भी खतरे का सामना करने के लिये ऐसा किया गया है। लेकिन जिस तरह से उसने पश्चिमी पठार की ऊंचाइयों पर अपने युद्धक विमानों की तैनाती बढ़ा दी है, वह भारत के लिये अतिरिक्त चिंता की बात है। क्योंकि चीनी सेना ने हल्के और बहुआयामी युद्धक विमान जे-10, सिंगल सीटर ट्विन इंजन फाइटर जेट जे-11 और युद्धक विमान जे-20  को तैनात किया है, वह भारत की सामरिक और रणनीतिक चिंता बढ़ाने को काफी है।

बताते चलें कि चीन की सेना के साथ पूरे वास्तविक नियंत्रण रेखा पर अक्सर झड़पें होती रहती हैं। ये झड़पें पीपुल्स लिबरेशन आर्मी द्वारा अतिक्रमण की कोशिशों के कारण होती हैं। हैरत की बात है कि नौसेना प्रमुख एडमिरल सुनील लाम्बा इस बात की चिंता प्रकट कर रहे हैं, जबकि सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत लोगों को आश्वस्त कर रहे हैं कि डोकाला में स्थितियां बहुत अच्छी है और चिंता का कोई कारण नहीं है। जबकि हकीकत यह है कि पिछले साल के डोकाला संकट की तरह ही चीन की आक्रामकता के बढ़ने का स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं।

चीन के साथ हालिया घटनाओं की वजह से ‘सिलीगुड़ी कॉरिडोर’ को लेकर भी संशय पैदा हो गए हैं, क्योंकि सिलीगुड़ी कॉरिडोर 22 किलोमीटर लम्बा भूमि का वह संकीर्ण दायरा है, जो पूर्वोत्तर के आठ राज्यों को शेष भारत से जोड़ता है। इसे चिकेन नेक के नाम से भी जाना जाता है। सुकून की बात यह है कि भारत सरकार भी अपनी ओर से इस मामले में कोई भी चूक करना नहीं चाह रही है। यही वजह है कि सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत, विदेश सचिव विजय गोखले और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल फरवरी महीने की शुरुआत में ही भूटान दौरे पर गए थे और डोकाला मसले पर चर्चा की थी। उधर, संसद की एक समिति ने भी डोकाला मुद्दे समेत भारत-चीन सम्बन्धों पर उसे विस्तृत जानकारी देने के लिये पूर्व सेना प्रमुख दीपक कपूर, चीन में राजदूत रहे नलिन सूरी और सेना के सेवानिवृत्त अधिकारी विनायक भट्ट को जानकारी देने के लिये बुलाया है। इसके अलावा, विदेश मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी भी इसी बारे में संसदीय पैनल को अपनी अपनी जानकारी देंगे।

गौर करने वाली बात यह भी है कि मालदीव संकट के बीच 11 चीनी युद्धपोत जिस तरह से पूर्वी हिन्द महासागर में पहुंचे हैं, उससे उसके खतरनाक इरादों का पता चलता है। दरअसल, मालदीव में प्रभाव विस्तार के मद्देनजर भारत और चीन की प्रतिद्वंद्विता पुरानी है। मालदीव के मौजूदा राष्ट्रपति यामीन चीन के समर्थक हैं, जबकि पूर्व राष्ट्रपति नसीद भारत के समर्थक रहे हैं। चूंकि यामीन ने चीन के साथ बेल्ट एंड रोड परियोजना के लिये समझौता कर लिया है, इसलिये चीन उनका नया रक्षक बनकर उभरा है जो भारत के लिये चिंता की बात है। कहना न होगा कि जिस तरह से विध्वंसक पोतों का एक बेड़ा और एक फ्रिजेट, तीस हजार टन का एंफीबियस ट्रांसपोर्ट डाक और तीन टैंकर हिन्द महासागर में पहुंच गए हैं, वह भारत की चिंता बढ़ाने के लिये काफी है। क्योंकि जहां पर चीनी युद्धपोतों और अन्य साजो-सामान की तैनाती की गई है, उस जगह से भारतीय और चीनी नौसेना के बीच का फासला ज्यादा नहीं है।

चीन के ताजा रुख से स्पष्ट है कि वह भारत के पड़ोसी देशों यथा पाकिस्तान, बंगलादेश, नेपाल, श्रीलंका व मालदीव जैसे देशों में आर्थिक परियोजनाओं के बहाने अपना दखल बढ़ाएगा। जिसे रोकने के लिये भारत को अपने राजनीतिक और कूटनीतिक पहल तेज करने होंगे। भारत को यह नहीं भूलना चाहिए कि चीन की अर्थव्यवस्था ने पिछले तीन दशकों में काफी तेजी से तरक्की की है और दुनिया की फ़ैक्टरी बन चुका है। इसलिये अब उसकी कोशिश है कि बीआरआई परियोजना के माध्यम से वह दक्षिण-पूर्व एशिया, पूर्व एशिया, मध्य एशिया, पश्चिम एशिया, हिन्द महासागर और प्रशांत महासागर के देशों में अपना राजनीतिक और कूटनीतिक दबदबा बढ़ाए। लेकिन भारत ऐसा होने देना नहीं चाहता है।

उल्लेखनीय है कि भारत भी अमेरिका, जापान और आस्ट्रेलिया के सहयोग से सार्क देशों, आशियान देशों, पूर्वी देशों और अरब देशों में अपना हस्तक्षेप बढ़ाना चाह रहा है, जिससे चीन व्याकुल है। यही नहीं, चीन को यह भी पता है कि अमेरिकी नेतृत्व वाले ‘नाटो पैक्ट’ और कभी सोवियत रूस (अब रूस) के नेतृत्व वाले ‘वारसा पैक्ट’ की तरह ही भारत भी अपने नेतृत्व वाले कोई ‘क्षेत्रीय पैक्ट’ बनाने की कोशिशों में जुटा हुआ है, जिससे निकट भविष्य में चीन की चुनौती बढ़ने वाली है। इसलिये वह समय रहते ही किसी न किसी बहाने भारत पर युद्ध थोपकर, भारत और उसके मित्र देशों की कमर तोड़ने की फिराक में है, ताकि वह पूरी दुनिया का नया दादा बन सके।

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