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दिल्ली सरकार में बढ़ते अविश्वास से कलंकित हुई व्यवस्था

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आलेख : कमलेश पांडे, वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार। दिल्ली सरकार में राजनेताओं और नौकरशाहों के बीच बढ़ते अविश्वास के जो हैरतअंगेज नतीजे सामने आये हैं, वह दुनिया के सबसे बड़े और सफल लोकतंत्र के लिये कोई शुभ संकेत नहीं है। यूँ तो जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों की यह रार दशकों पुरानी है, लेकिन स्थिति की गम्भीरता का पता इस बात से चलता है कि विभिन्न राज्य सरकारों से लेकर केंद्र सरकार तक ऐसे अंतर्विरोधों से जूझ रही हैं। आलम यह है कि मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक ऐसी चिंताएं व्यक्त कर चुके हैं, फिर भी नौकरशाही नहीं ‘सुधर’ रही?

इस बात में कोई दो राय नहीं कि जब किसी जनतांत्रिक व्यवस्था में राजनेताओं और अधिकारियों के ऊपर व्यक्तिगत हित हावी हो जाता है तो फिर वैसा ही होता है, जैसा कि दिल्ली सरकार में दिखा। यहां पर मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव के बीच बढ़ते अविश्वास का जो बिकराल रूप सामने आया, वह ‘आप’ के बगावती रुख से कहीं आगे का संदेश है। दो टूक कहें तो पार्टी अब केंद्रीय सेवा के अधिकारियों को कड़ा जवाब देने के मूड में दिखाई दे रही है!

जरा कल्पना कीजिये कि यदि नौकरशाही की उलटबाँसी से पीड़ित जनता भी जब अपने चुने हुए नेताओं के साथ हो लेगी तो फिर क्या होगा? क्या नौकरशाही की घिग्घी नहीं बंध जाएगी? क्या पुलिस-पब्लिक में संघर्ष बढ़ने से संवैधानिक संकट खड़ा नहीं हो जाएगा? इसलिये राजनेताओं और नौकरशाहों को चाहिए कि वे लोग व्यक्तिगत और दलगत हित से ऊपर उठकर व्यापक जनहित तथा राष्ट्रहित के प्रति संजीदा रहें, अन्यथा बात आगे और भी बिगड़ेगी, क्योंकि जनता अब जागरूक हो चुकी है।

विशेषकर नौकरशाहों को यह बात तो कतई नहीं भूलना चाहिए कि उनके कुछेक पक्षपाती रुख से भारत के संघीय स्वरूप की सफलता पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं? क्योंकि केंद्र और राज्य में परस्पर विरोधी दलों की सरकार होने पर स्थिति और भी बिगड़ जाती है। चूंकि बीजेपी और आप, दोनों पार्टियां एक दूसरे को कतई नहीं देखना चाह रही हैं, इसलिये नौकरशाहों का उत्तरदायित्व और बढ़ जाता है।

यह ठीक है कि आजाद भारत में राजनीति की पहली पीढ़ी के राजनेताओं ने प्रशासन के साथ नीतिगत तालमेल बिठाने की पूरी कोशिश की, फिर भी कुछेक विरोधाभाष पैदा हुए ही। लेकिन दूसरी पीढ़ी के राजनेताओं ने तो आक्रामक तेवर दिखाए। उन्होंने जनहित वाले कार्यों की उपेक्षा के मद्देनजर नौकरशाहों की सार्वजनिक आलोचना की। इससे अधिकारी भी विचलित हुए और समाज का हर वर्ग अचंभित हुआ।

इसका फलाफल यह हुआ कि पहले जनहित के प्रति समर्पित रहने वाले अधिकारी अब भयमुक्त होकर मनपसंद नेताओं के साथ लोकतांत्रिक बंदरबांट में जुट गए! वे घात-प्रतिघात की राजनीति में अपना परोक्ष योगदान देने लगे। लेकिन सियासत की तीसरी पीढ़ी के चतुर राजनेताओं ने जब प्रचलित लोकतांत्रिक लूट को अपनी अपनी जरूरतों के हिसाब से परिभाषित करना चाहा, तो उसमें कानूनी रूप से नौकरशाहों के फंसने के आसार बढ़ गए। लिहाजा, दोनों के बीच रार भी बढ़ गई। अलबत्ता, जब नौकरशाह उनकी बातों को मानने से इनकार करने लगे तो कुछेक वरिष्ठ अधिकारियों के साथ उनके समर्थक मारपीट पर उतर आये, जो कि चिंता की बात है।

गत दिनों दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव अंशु प्रकाश के साथ मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के सरकारी आवास पर आधी रात में कुछ जनप्रतिनिधियों द्वारा की गई बदसुलूकी किसी भी सभ्य समाज के लिये जनचिन्ता का विषय है। इसलिये सवाल है कि क्या दिल्ली के ढाई लाख परिवारों के आधार कार्ड उनके राशन कार्ड से लिंक नहीं होने के चलते राशन मिलने से वंचित कर दिए गए, जिससे जनप्रतिनिधि भी आवेश में आकर ऐसी शर्मनाक हरकत को अंजाम दे दिए, जायज है? या फिर, मुख्य सचिव श्री प्रकाश द्वारा यह कहने मात्र कि किसी भी सरकारी विज्ञापन का प्रसारण सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश के मुताबिक ही सम्भव है, से जनप्रतिनिधि उग्र हो गए और अतिथि सत्कार की बात भूलकर ऐसा अशोभनीय व्यवहार कर डाले, जिसकी जितनी भी निंदा की जाए, वह कम है।

दरअसल, विधायिका और कार्यपालिका के इस टकराव में सबसे अधिक विचलित करने वाली बात यह है कि अतिमहत्वपूर्ण व्यक्तियों की सुरक्षा की जो रूपरेखा बनती है, उसमें ऐसी वीभत्स स्थितियों की पूर्व परिकल्पना क्यों नहीं की जाती, और फिर उसके अनुरूप अतिआवश्यक उपाय पहले से ही क्यों नहीं किये जाते? खैर, इस मामले में मुख्य सचिव अंशु प्रकाश ने उपराज्यपाल अनिल बैजल से मिलकर घटना की पूरी जानकारी दी और उनकी शिकायत पर सिविल लाइन्स थाने में कुल ग्यारह विधायकों पर केस दर्ज किया गया है। इस मामले में  पुलिस ने नामजद विधायक अमानतुल्लाह खां को गिरफ्तार कर लिया है। उनसे पहले ही देवली विधायक प्रकाश जारवाल को भी गिरफ्तार कर लिया गया था। अन्य लोगों के खिलाफ भी पुलिस की दबिश जारी है। इस घटना से जनप्रतिनिधियों के विशेषाधिकारों और उनके अभद्र व्यवहारों पर भी एक नई बहस छिड़ चुकी है।

कहना न होगा कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी की राज्य सरकार के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और बीजेपी नीत एनडीए शासित केंद्र सरकार के नुमाइंदे उपराज्यपाल अनिल बैजल के बीच जो प्रशासनिक रस्साकशी चल रही है, उसके कई सियासी मायने हैं। पूर्व उपराज्यपाल नजीब जंग भी इसी दांवपेंच से परेशान होने पर हटा दिए गए। यह कौन नहीं जानता कि केजरीवाल सरकार का अधिकारियों के साथ शुरू से ही गहरा विवाद रहा है। सत्ता में आते ही इस सरकार के कर्ताधर्ता लोगों का मुख्य सचिव डीएम स्पोलिया, एमएम कुट्टी, कार्यवाहक मुख्यसचिव शकुंतला गैमलिन के अलावा धर्मपाल, अश्वनी कुमार, केशव चन्द्रा, के आर मीणा से हुआ विवाद जगजाहिर है। स्थिति की नजाकत देखकर केशव चन्द्रा और अश्वनी कुमार ने तो उपराज्यपाल को पत्र लिखकर आग्रह किया था कि उन्हें इस सरकार से हटा दिया जाये। लेकिन अब जब बात मारपीट की नौबत तक आ पहुंची है तो समझा जा सकता है कि स्थिति कितनी गम्भीर हो चुकी है।

दो टूक कहें तो सत्ता पक्ष-विपक्ष के स्वार्थपरक खेल में और नौकरशाही के दांवपेंचों से भारतीय राजनीति की दशा और दिशा दोनों किसी खतरनाक मोड़ पर जा पहुंची है। लेकिन उससे भी अधिक खतरनाक है भारतीय संविधान की मूल भावना और उस पर आधारित कानूनों की स्वार्थपरक व्याख्या करने वाले जिम्मेवार लोगों की मनोदशा, जिसे चाह कर भी बदला नहीं जा सकता! क्योंकि ऐसे लोग बात तो आम आदमी की करते हैं, लेकिन कानून हमेशा ही अभिजात्य वर्गीय हितों की रक्षा करने वाला बनाते हैं जिससे व्यापक जनहित सध नहीं पा रहा और लोगों की बेचैनी बढ़ती जा रही है।

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