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क्या वास्तव में अधिकारी से लेकर मंत्री तक की जेब गर्म हो रहीं हैं

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क्या वास्तव में अधिकारी से लेकर मंत्री तक की जेब गर्म हो रही है…: नितेश चौधरी

सफर के दूसरे दिन ठंड से हल्की राहत मिलती दिखाई थी , लेकिन व्यवस्था की विसंगति ने शीतलता को गति दें दी। सफर जन्दाहा प्रखंड के खोपी पंचायत अन्तर्गत आंगनबाड़ी केंद्र संख्या 37 जा रूकता हैं । मौजूद है अंचलाधिकारी योगेंद्र सिंह दलबल के साथ। पूर्व जानकारी के अनुसार सेविका भी सजधज के तैयार हो केंद्र संचालन में लगी है। केंद्र में बच्चे भी कहीं से 09 की संख्या में यत्र-तत्र अवस्था में मौजूद थे, जो देखने से लग रहे थे जैसे” बिना आदत के सवार कश” दिया घोड़ा सड़क पर दौड़ रहा हो ।

हरिजन टोली में चलने वाला आंगनबाड़ी केंद्र दरवाजे पर आराम से चल रहा है। दरवाजे पर चलाने में बाल विकास परियोजना कार्यालय की भी भूमिका निहित है। सुपरवाइजर सप्ताह में निरिक्षण करने के बदले माहीने में एक बार करती है, जो निरिक्षण पंजी में अंकित था ।

चालीस बच्चे एक आंगनबाड़ी में दाखिल होते है, उनमें अंचलाधिकारी के जाँच से पहले एक भी आजतक अनुपस्थित नहीं पाये गये। जिस चुल्हा पर खाना बनाना सरकार गृहिणीयों के लिए अभिशाप मानकर उज्वला या अन्य योजनाओं के माध्यम से गैस चुल्हा दे रही है, उसी पर खाना बनने की बात सेविका द्वारा जाँच पदाधिकारी को बताया गया, लेकिन खाना बनने के जुगात दूर-दूर तक दिखाई नहीं दिया। सेविका की व्यवस्था और मौजूद स्थानीय लोगों के अनुसार बच्चे केंद्र में खाने-पीने की बात जानते ही नहीं है। ग्रामीणों की माने तो कभी मिले तब तो बच्चे पुलाव और हल्वा जैसे शहरी खाने की नाम जान सकें। कुल मिलाकर देखा जाये तो व्यवस्था नदारद।

अब थोड़ा नजर गर्भवती महिला को कुपोषण से मुक्ति दिलाने वाली टीएचआर को देख लीजिए। बतौर ग्रामीण आंगनबाड़ी केंद्र पर आजतक कभी कुछ नहीं दिया जाता है ।एक बुजुर्ग महिला याद करते हुए बताती है कि तीन साल पहले एकबार दो-दो डब्बे चावल और एक डब्बे दाल दिया गया था तीन-चार महिलाओ को। महिला के मुँह की बात छीनतेे हूए सेविका सुशीला देवी व्यथा प्रकट करने लगती है और दोष सरकार के मुल्यांकन नीति से लेकर कार्यालय की भ्रष्ट व्यवस्था पर डाल देती है।

बकौल सुशीला देवी सरकार के द्वारा चावल और दाल का कम दाम मिलता है, इसलिए तीन किलो चावल की जगह दो किलो और डेढ किलो दाल की जगह एक किलो देते है ।आखिर किसी तरह पूर्ति तो करना पड़ेगा न ।

मैने भी स्वर दे दी हां जी ।अंचलाधिकारी सत्यदर्शण करा रही सेविका की बाते सुनकर मुस्कुरा रहे थे ।मेरा कैमरा सेविका के एक-एक शब्द को अपने अन्दर सहेज रहा था । लेकिन तभी किसी चतुर की नजर मेरे कैमरे पर जा टीका और उसने सेविका को सतर्क कर दिया ।हालांकि सेविका कार्यालय लागत पर ही आकर रूकी ।

बकौल अंचलाधिकारी आपकी नैतिक जिम्मेवारी है कि अपने लोगों के साथ चोरी और धोखाधड़ी नहीं करें ।बच्चे आपके घर और समाज के है, गर्भवती महिला भी आपकी ही है, आखिर आप इनसे बईमानी कर महान अपराध कर रही है । भगवान के यहाँ से आपको माफी नहीं मिलेगी । एक तो आप अपने घर पर केंद्र चलाकर नियम का उल्लंघन कर रहीं हैं और दुसरी टीएचआर की चोरी करते हैं ।आपके विरुद्ध रिपोर्ट जिलाधिकारी को किया जायेगा और कारवाई भी आपके उपर होगी ।

तभी मुलाकात एक परिचित के सेविका पति से होती है और वो बुलाकर कान में चुपके से कहता है कि भाई दो हजार से बढ़ाकर कार्यालय ने चार हजार फीस कर दिया ।आखिर अब आप ही बताइए क्या कर सकती है सेविका ।

सेविका पति की बातों ने मेरे माथे पर भी जोर का झटका धीरे से दिया तथा एक अनुत्तरित प्रश्न उमड़ने-घुमड़ने लगा कि शायद सरकार के द्वारा अव्यवहारिक खाद्यान्न मूल्य निर्धारण और राजनेताओं के प्रपंच में पदाधिकारीयों की भ्रष्टकोख में पल्वित होकर आंगनबाड़ी के दुर्दशा रूपी संतान जन्मित होकर कुपोषितो को कुपोषित करने में लगा हैं ।

अब सवाल उठता है कि आखिर सरकार किस पैमाने का उपयोग करती है, जो देय किमत और बाजार मूल्य से मेल नहीं खाती? आखिर ये कैसी लूट की संरचना है जिसमें बाल विकास परियोजना कार्यालय खुलेआम चार हजार रुपये मासिक लेकर किसी भी जाँच के औचित्य को औपचारिकता मानकर चलती है? क्या वास्तव में लोकोपवाद की सरजमी को सिंचित हो रही है, जिसमें रिश्वत की हिस्सेदारी अधिकारी से लेकर मंत्री जी तक की बात कही जाती है? और यदि ऐसा नहीं है तो किस हैसियत से गरीब कुपोषित महिलाओं के आहार का भक्षण संबद्ध पदाधिकारी और जनप्रतिनिधि कर रहें है ।

आखिर क्यों नहीं सरकार इसकी उच्च स्तरीय जांच कराकर दोषीयों को डंड दे रहीं ताकि बच्चों के आहार और व्यवहार का लूट बंद हो सकें । आखिर ग्राम पंचायत के अधिनियमित संस्था का लुटेरा अधिकारी, प्रमुख और विधायिका कैसे?

अनंत सवाल सरकार की मंशा को कटघरे में खड़ा कर रही है, इसलिए सरकार को अपनी मंशा स्पष्ट करना चाहिए और यदि वास्तविक उद्देश्य की पूर्ति करना है तो बाल विकास परियोजना जैसे भ्रष्टाचार के आकंठ में डूबे विभाग पर सख्त रवैया अपनाने की आवश्यकता है ताकि बाल आहार और कुपोषितो का आहार संरक्षित होकर कुपोषण के अभिशाप से मुक्ति मिल सकें ।

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