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बिहार के शौचालय घोटाले में सम्मिलित हुए वैशाली जिले का जन्दाहा प्रखंड

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रिपोर्ट: शिशिर समीर । निदेशक डीआरडीए के निर्देश पर जन्दाहा प्रखंड के सत्तरह पंचायतों में अकार्यरत शौचालयों के स्थल जाँच के क्रम में व्यापक घोटाले होने की संभावना व्यक्त की जा रही है ।शौचालय निर्माण तो दूर की बात है, जाँच कर्मी को सूची में अंकित व्यक्ति उस गाँव क्या पंचायत में ही नही मिल रहे है और वैसे लोगों की संख्या बहुत बड़ी है ।

दिनांक 06-12-2017 को निदेशक डीआरडीए के राज्य स्तरीय बैठक में अकार्यरत शौचालयों के भौतिक सत्यापन करने का निर्देश सभी उपविकास आयुक्त को मिला था ।निर्देश के आलोक में जिला विकास अभिकरण ने सभी प्रखंड विकास पदाधिकारी को अकार्यरत शौचालय की सूची उपलब्ध कराते हुए भौतिक सत्यापन कर अकार्यरत रहने के कारणो का रिपोर्ट दिनांक 17-12-2017 को कराने का निर्देश दिया गया । प्रखंड विकास पदाधिकारी ने कृषि सलाहकार, आवास सहायक, पंचायत रोजगार सचिव, विकास मित्र और कोर्डिनेटर से विभिन्न पंचायत के जिला से प्राप्त सूची का भौतिक सत्यापन कराया गया। जांच के क्रम में जो जानकारी जांचकर्ता को मिली, उससे न केवल जाँचकर्मी, बल्कि पदाधिकारी भी भौंचक है।

चाँदसराय के मुखिया त्रिवेणी चौधरी और कृषि सलाहकार ने बताया कि बिसोपट्टी गाँव के दो सौ लाभुक का नाम सूची में दर्ज है, जो साहनी और पटेल समुदाय के है, लेकिन इन दोनो समुदाय के व्यक्ति इस गाँव क्या पंचायत में ही नही है। चाँदसराय पंचायत के 979 व्यक्तियों के सूची में एक भी नही मिला। वही हाल बस्सी, लोमा , हरिप्रसाद, ग्राही आदी पंचायतों की है ।हालाकि लक्ष्मीपुर बरबट्टा , मानसिंह पुर, बिझरौली, जन्दाहा और डीह बुचौली में इन पंचायतों के अपेक्षा स्थिति कुछ अच्छी है ।

बतौर प्रखंड विकास पदाधिकारी मुकेश कुमार ने बताया कि जिला से 5749 व्यक्ति की सूचि प्रखंड को प्राप्त हुआ था। जांच के दौरान जो रिपोर्ट प्राप्त हुई है उसमें 816 कार्यरत,1132 अकार्यरत और 3801 ट्रेसलेस पाये गये है, जिसकी रिपोर्ट जिला को भेजा जा रहा है ।

इसे घोटाला मानने की बात पर प्रखंड विकास पदाधिकारी ने फिलहाल कुछ भी कहने से इंकार किया। प्रखंड विकास पदाधिकारी ने कहा कि जिला से जो निर्देश प्राप्त होगा, उसके अनुरूप आगे की कार्रवाई की जायेगी ।
स्थानीय लोगों की माने तो जो भी कार्यरत शौचालय है, वो सूची में दर्ज व्यक्ति के द्वारा हाल के दिनो में स्वयं बनाया गया है ।वहीं चर्चा इस बात की भी है कि आखिर पाँच पंचायतों की जाँच क्यों नहीं की गई । लोगों को अंदेशा बना है कि प्रशासन जाँच से वंचित पंचायत के घोटाले को दबाने की कोशिश तो नहीं कर रही है।

जानकार सूत्रों की माने तो वर्ष 2007,08,09 में एनजीओ के द्वारा पीएचडी से वीपीएल परिवार का शौचालय बनबाया गया था । एनजीओ ने विभागीय कर्मचारी और पदाधिकारीयों की मदद से नियमों को ताक पर रखकर शौचालय के महाघोटाले को अंजाम दिया। अब सवाल उठता है कि इतनी बड़ी फर्जीवारे की खुलासे के बाद उच्च स्तरीय जाँच अभी तक क्यों नहीं ।

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