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स्वदेशी और स्वावलंबन से खत्म होगी बेरोजगारी : विनोद शंकर चौबे

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नलिनी भारद्वाज, लखनऊ। उद्यमिता विकास या तकनीकी सभी चिंतनों में शामिल होता है। हम अपने आप को भूल गए हैं, अपनी बुनियादी चीजें छोड़ दीं। पंडित दीनदयाल उपाध्याय गांधी के चिंतन को आगे लेकर गए। प्राकर्तिक संसाधनों को विध्वंस किए बगैर हमें विकास लाना है। सब कुछ तो सबका है ईश का है। त्याग के साथ भोग करना चाहिए जिससे किसी के साथ सामाजिक और आर्थिक अन्याय न हो। यह बातें पूर्व आईएएस अधिकारी विनोद शंकर चौबे ने मंगलवार को कहीं। वे भारतीय उद्यमिता संस्थान की ओर से विश्व संवाद केंद्र के लखनऊ जनसंचार संस्थान में आयोजित प्रशिक्षक कार्यशाला के प्रतिभागियों को संबोधित कर रहे थे।

उन्होंने बताया कि उद्यमिता विकास में कठिन चुनौतियां हैं। पंचवर्षीय योजनाओं का मूल्यांकन करने पर पता चलता है कि अनेक योजनाओं पर आकूत धन व्यय कर दिया। अगर हम छोटी परियोजनाएं बनाते तो हालात कुछ और होते। बड़ी परियोजनाओं ने बेरोजगारी कम करने की अपेक्षा बढ़ाई है। उद्यमिता के लिए सबसे अच्छा होगा कि स्थानीय जरूरतों, उपलब्ध संसाधनों के अनुसार तकनीकी को इस्तेमाल किया जाता। भारत में खुद ऐसा सामाजिक और आर्थिक चिंतन विद्यमान है जो त्याग के साथ भोग करने की बात कहता है।

उन्होंने बताया कि ग्रामीण पलायन काफी चिंताजनक स्थिति है। रूस का अंधानुकरण कर हमने देश पर पंचवर्षीय योजनाएं थोप दीं। इन योजनाओं ने देश के पर्यावरण और प्रकृति को नष्ट कर दिया। हमें अपनी सांस्कृतिक पहचान के आधार पर आर्थिक ढांचा विकसित करना पड़ेगा। अयोध्या, काशी और मथुरा हमारे लिए रेवन्यू मॉडल भी हो सकते हैं। श्रीराम, श्रीकृष्ण और भगवान शंकर ने स्वदेशी का चिंतन दिया है। पश्चिम का रिलीजन भारतीय धर्म के समानांतर नहीं है। नैतिकता, मूल्य, नीति, शुचिता, न्याय, सत्य और परोपकार ही हमारा धर्म है।


उन्होंने बताया कि उद्यमिता विकास के प्रहरी को जोड़ने का काम करना है। अब तक समाज विभाजित करने के षणयंत्र देश पर थोपे गए। ऐतिहासिक छोकरों ने इतिहास के नाम पर अंग्रेजों और मुगलों का महिमामंडन किया। अंग्रेजी और अंग्रेजियत से हमारा पराभव और अवनति हुई है। बृहत्तर भारत के सिद्धांत के स्थान पर दक्षिण एशिया कहना शुरू कर दिया। एकता पहले है विविधता बाद में। हम तिब्बत को मान्यता प्रदान किए होते तो चीनी इकॉनमी हम।पर हावी न हो पाती। हमने 1948 में ही।तिब्बत चीन की झूली में सौंप दिया। उद्यमिता विकास पर काम करने वालों का मुकाबला सीधे चीन के लड़ाकों से होना है।

उनका कहना था कि चीन हमें व्यापार में हजारों अरब का नुकसान कर रहा है। हम कौन सी तकनीकी इस्तेमाल करें कि अपनी विशाल जनसंख्या का न सिर्फ पेट भर सकें बल्कि उनको रोजगार देकर गरिमापूर्ण जीवन स्तर दे सकें। भारत में कुटीर, लघु और माध्यम उद्योगों को विकसित कर ही बेरोजगारी की चुनौतियों का सामना कर सकते हैं। गांवों में वो छमता होती है कि शहरों की मजबूरी होगी कि वो खुद चलकर जाएंगे। पंचवर्षीय योजनाओं में जितना धन हमने बर्बाद किया उतना ही अगर स्थानीय और गांवों में विकसित किए होते तो बेरोजगारी विकराल नहीं होती। बेरोजगारी वर्तमान में हिंसक होने की ओर है, उद्यमिता ही उसका समाधान हो सकता है। बगैर नीतियों में परिवर्तन किए देश को समावेशी विकास की ओर नहीं ले जा सकते।

लखनऊ के क्षेत्रीय समन्वयक डॉ आशीष भटनागर ने बताया कि भारतीय उद्यमिता विकास संस्थान को एसबीआई, आएफसीआई, आईडीबीआई और बैंक ने मिलकर स्थापित किया है। यह संस्थान सूक्ष्म, मध्यम और लघु उद्यम के विस्तार के लिए काम कर रहा है। केंद्र और विभिन्न राज्यों की सरकारों की अनेक योजनाएं संचालित हैं। यह प्रशिक्षण केंद्र के डीएसटी द्वारा प्रायोजित है। राष्ट्रीय विज्ञान एवं तकनीकी उद्यमिता परिषद भारत में उद्यमिता विकास के काम कर रहा है। कार्यक्रम का मकसद है कि पहले ट्रेनर्स को प्रशिक्षित करें। केवीआईसी, एमएसएमई, रूरल डेवलपमेंट जैसे विभागों के साथ मिलकर ईडीआई उद्यमिता विकास को प्रोत्साहित कर रही है।

गोरखपुर के क्षेत्रीय समन्वयक श्री पीएन श्रीवास्तव ने बताया कि यह ट्रेनिंग ऑफ ट्रेनर्स प्रोग्राम है। बतौर ट्रेनर हम लोग ट्रेन होंगे। कैसे हम उद्यमी बनाकर बेरोजगारी को दूर कर सकें। उद्यमियों को प्रशिक्षित करना आज की बड़ी समस्या है। ऋण लेने की प्रक्रिया, उद्यम स्थापित करने की तकनीकी बारीकियों की जानकारी 12 दिनों तक दी जाएगी।

कार्यशाला के प्रतिभागियों को लखनऊ जनसंचार एवं पत्रकारिता संस्थान के निदेशक अशोक कुमार सिन्हा, ईडीआई के रमाशंकर त्रिपाठी ने भी संबोधित किया। प्रशिक्षण में विभिन्न विश्वविद्यालयों के प्रतिभागी 12 दिन तक प्रशिक्षक प्राप्त करेंगे। इसी दौरान प्रतिभागियों को इंडस्ट्री विजिट भी कराई जाएगी, जिससे सभी को प्रत्यक्ष अनुभव का लाभ मिल सकेगा। 30 मार्च को सभी प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र वितरित किए जाएंगे।

नलिनी भारद्वाज, लखनऊ। उद्यमिता विकास या तकनीकी सभी चिंतनों में शामिल होता है। हम अपने आप को भूल गए हैं, अपनी बुनियादी चीजें छोड़ दीं। पंडित दीनदयाल उपाध्याय गांधी के चिंतन को आगे लेकर गए। प्राकर्तिक संसाधनों को विध्वंस किए बगैर हमें विकास लाना है। सब कुछ तो सबका है ईश का है। त्याग के साथ भोग करना चाहिए जिससे किसी के साथ सामाजिक और आर्थिक अन्याय न हो। यह बातें पूर्व आईएएस अधिकारी विनोद शंकर चौबे ने मंगलवार को कहीं। वे भारतीय उद्यमिता संस्थान की ओर से विश्व संवाद केंद्र के लखनऊ जनसंचार संस्थान में आयोजित प्रशिक्षक कार्यशाला के…

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