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समावेशी-टिकाऊ विकास: चाल, चरित्र और चेहरा

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आलेख: कमलेश पांडे, वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार। किसी भी देश में लोकतंत्र की सफलता उसके ‘समावेशी और टिकाऊ विकास’ की गति पर निर्भर करता है। इसका चरित्र क्या हो, चेहरा कैसा हो, यह यक्ष प्रश्न किसी भी सत्तारूढ़ सरकार को  बेचैन किये रहता है। निःसंदेह जो सरकार इस सवाल का समुचित जवाब देने में सफल रहती है, वह रिपीट करती है। और जो सरकार लापरवाही बरतती है, उसे उसका राजनैतिक खामियाजा भी भुगतना पड़ता है।

अतीत साक्षी है कि समावेशी और टिकाऊ विकास के मोर्चे पर विफल रहने के चलते ही कांग्रेस नीत यूपीए सरकार का पतन हुआ। इसलिये परवर्ती बीजेपी नीत एनडीए सरकार, विशेषकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस मसले पर अपेक्षाकृत अधिक सजग हैं और समावेशी व टिकाऊ विकास के लिये प्रतिबद्ध भी। उन्होंने इसकी चाल, चरित्र और चेहरा, तीनों बदल दिया। सबसे पहले उनने उन विरोधाभाषी नीतियों पर हमला किया, जो उनकी पूर्ववर्ती सरकारों के लिये परेशानियों का सबब बन चुकी थीं। फलतः वे अपने मकसद में कामयाब हुए और सुस्त भारतीय अर्थव्यवस्था को एक नई गति मिली।

अब तो आम चुनाव 2019 के मद्देनजर मोदी सरकार न केवल इस अहम मुद्दे पर फोकस कर रही है, बल्कि बीते चार वर्षों में उसने जो कुछ भी किया, उसे ताजा आर्थिक सर्वेक्षण 2018 के बहाने जनता से साझा भी किया और आगे भी ऐसा ही करते रहने की प्रतिबद्धता जताई। सर्वाधिक गौर करने वाली बात यह है कि उसने विकास के इस नजरिए से अर्थव्यवस्था के उन अहम क्षेत्रों की पहचान भी कर ली है, जहाँ उसे अपने कार्यक्रम को दृढ़तापूर्वक लागू करना है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जितनी संजीदगीपूर्वक अपनी अप्रत्याशित आर्थिक नीतियों, यथा- डीबीटी, जनधन योजना, नोटबन्दी, जीएसटी, बेनामी सम्पत्तियों की धरपकड़ आदि समेत दर्जनाधिक सुधार कार्यक्रमों को लागू कर रहे हैं, उससे भी इसके महत्व को समझा जा सकता है। वास्तव में, मोदी सरकार ने विगत साढ़े तीन सालों में अभूतपूर्व नीतिगत पहल करने की सफल कोशिश की है, जिसके सुखद परिणाम अगले वित्त वर्ष तथा आने वाले वर्षों में मिलने के प्रबल आसार हैं।

खास बात यह कि मोदी सरकार समावेशी और टिकाऊ विकास के लक्ष्य को हासिल करने के लिए शिक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य तथा सामाजिक सुरक्षा जैसी सामाजिक अवसंरचना को सर्वोच्‍च प्राथमिकता दे रही है, जो जायज है। इस बात के सबूत ताजा आर्थिक सर्वेक्षण से भी मिलते हैं। मतलब साफ है, वह यह कि सरकार अब यह मान चुकी है कि सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र के बिना राजनीतिक लोकतंत्र स्थायी नहीं हो सकता, इसलिये समावेशी और टिकाऊ विकास से जुड़े पहलुओं को पूरी तरह से दुरुस्त करने का भगीरथ प्रयत्न कर रही है।

केन्‍द्रीय वित्‍त मंत्री अरुण जेटली ने भी संसद के पटल पर आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18 प्रस्‍तुत करते हुए सदन को आश्वस्त किया है कि ‘सामाजिक अवसंरचना, रोजगार एवं मानव विकास’ के मसले पर शिक्षा, कौशल विकास, रोजगार, आय सृजन में बालक-बालिका अनुपात की खाइयों को पाटने के लिये सरकार सचेष्ट है। साथ ही, समाज में पर्याप्‍त सामाजिक विषमताओं को कम करने हेतु मानव क्षमताओं में संवर्धन के लिए उनकी विकास कार्यनीति के अंतर्निहित लक्ष्‍यों में से एक रहे हैं।

बेशक भारत विश्‍व की अग्रणी ज्ञान अर्थव्‍यवस्‍थाओं में से एक के रूप में उभर रहा है। लिहाजा सरकार ने तय किया है कि शिक्षा, कौशल विकास एवं स्‍वास्‍थ्‍य मौजूदा सरकार के लिए भी प्राथमिकता क्षेत्र बनी रहेंगी। इसके लिये सरकार स्वनिर्धारित योजनाओं के समन्‍वय द्वारा व्‍यय दक्षता में सुधार के लिए निर्धारित कदमों के अंगीकरण के साथ-साथ मानव पूंजी पर व्‍यय में बढ़ोतरी करती रही है।

आंकड़े साक्षी हैं कि जीडीपी के एक अनुपात के रूप में केन्‍द्र एवं राज्‍यों द्वारा सामाजिक सेवाओं पर व्‍यय 2012-13 से 2014-15 के दौरान 6 प्रतिशत के दायरे में बना रहा था। जबकि 2017-18 (बजट अनुमान) में सामाजिक सेवाओं पर व्‍यय 6.6 प्रतिशत है। लिहाजा, आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18 में अनुशंसा की गई है कि सूक्ष्‍म आर्थिक विकास और प्रभावी बाजार की अनिवार्यता बरकरार रखते हुए यह सुनिश्चित करना भी आवश्‍यक है कि विकास के लाभ सभी नागरिकों तक समान रूप से पहुंचे। साथ ही नीति एवं संस्‍थागत आर्थिक प्रणाली की सहायता करने वाले समावेशी विकास का सुदृढ़ीकरण हमारी सर्वोच्‍च नीतिगत प्राथमिकता होनी चाहिए।

आंकड़े बताते हैं कि सिर्फ पिछले बजट 2017-18 में ही 1 करोड़ परिवारों को गरीबी से मुक्ति दिलाने का लक्ष्‍य सरकार ने रखा गया, जबकि 50,000  ग्राम पंचायतों को साल 2019 में महात्‍मा गांधी की 150वीं जयंती तक गरीबी से मुक्‍त करना तय किया गया है। यह बात दीगर है कि सवा अरब देशवासियों में व्याप्त भय, भूख और भ्रष्टाचार के नजरिये से ये सरकारी उपाय ऊंट के मुंह में जीरा के समान प्रतीत हो रहे हैं।

लिहाजा, वित्‍तीय समावेश के लिए प्रधानमंत्री जन धन योजना, प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना, प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना, असंगठित क्षेत्र हेतु अटल पेंशन योजना, सीधे लाभार्थियों के बैंक खातों में रुपये डालने के लिये डीबीटी योजना, एलपीजी उपभोक्‍ताओं के लिए प्रत्‍यक्ष लाभ हस्‍तांतरण (डीबीएलटी) योजना, गरीबों के लिये राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (एनएफएसए) को 11 राज्यों से बढ़ाकर पूरे देश में विस्‍तार देने से समावेशी और टिकाऊ विकास की उनकी कोशिशें परवान चढ़ी हैं।

यही नहीं, दीन दयाल अंत्योदय योजना, स्‍वयं-सहायता समूहों (एसएसजी) को वित्तीय मदद, प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत बीपीएल परिवारों की महिलाओं को मुफ्त एलपीजी कनेक्‍शन, बीपीएल परिवारों को सात करोड़ गैस कनेक्शन देने का निर्णय, हर हाथ को काम देने हेतु निर्धनों के लिये ग्रामीण क्षेत्रों में प्रत्येक वर्ष तीन लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की धनराशि व्यय किये जाने की जो पहल की गई, उससे समुचित और संतुलित विकास का माहौल बना है।

इतना ही नहीं, सरकार द्वारा भारतीय डाक भुगतान बैंक की पहल, प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम, गरीब कल्याण आय घोषणा योजना  2016, कामगारों को उनका सही हक दिलवाने के यथोचित उपाय, दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना, भारतमाला योजना, सागरमाला योजना आदि अभूतपूर्व नीतिगत उपायों और सुधारों से विकास कार्यों का समुचित विकेंद्रीकरण भी हुआ है।

सच कहा जाय तो समावेशी रोजगार केन्द्रित उद्योग को प्रोत्‍साहन एवं गतिशील अवसंरचना का निर्माण, आर्थिक एवं सामाजिक विकास के अहम कारक हैं। इस नजरिये से सरकार द्वारा अबतक की गई ‘क्षेत्र विशिष्ट सुधार पहलों’ से समग्र कारोबारी माहौल में उल्लेखनीय सुधार आया है। सरकार भी इस दिशा में कई विशिष्‍ट कदम उठा रही है। उसने इस्‍पात, परिधान, चमड़ा एवं बिजली क्षेत्र से जुड़ी विशिष्‍ट चुनौतियों का समाधान करने के लिए इनमें से प्रत्‍येक क्षेत्र में ‘क्षेत्र विशिष्‍ट सुधार कार्य’ आरंभ किए हैं, जिसके प्रयासों से कोयला, कच्‍चा तेल, प्राकृतिक गैस, पेट्रोलियम, रिफाइनरी उत्‍पाद, उर्वरक, इस्‍पात, सीमेंट एवं बिजली जैसे आठ प्रमुख अवसंरचना समर्थक उद्योगों में 2017-18 के अप्रैल नवंबर के दौरान 3.9 प्रतिशत की संचयी वृद्धि दर्ज की गई है।

स्पष्ट है कि एक ओर सरकार द्वारा औद्योगिक वृद्धि को बढ़ाने के लिये मेक इन इंडिया, स्‍टार्टअप इंडिया एवं बौद्धिक संपदा नीति जैसे कई कदम उठाए गए हैं, तो दूसरी तरफ सूक्ष्म और मध्यम उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिये एमएसएमई क्षेत्र हेतु प्रधानमंत्री मुद्रा योजना आरंभ की गई है, जिसका समावेशी और टिकाऊ विकास पर सकारात्मक असर पड़ा है। वैश्विक अवसंरचना आउटलुक का अनुमान है कि आर्थिक विकास एवं सामुदायिक कल्‍याण में बेहतरी लाने के लिए अवसंरचना का विकास करने हेतु भारत द्वारा 2040 तक 4.5 ट्रिलियन डॉलर के बराबर निवेश की आवश्‍यकता है। लिहाजा, भारत के दीर्घावधि विकास के लिए सरकार भी अवसंरचना विकास में अत्यधिक निवेश कर रही है।

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