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तमाम योजनाओं पर कालिख पोत रही है प्रखंड का एकमात्र कन्या उच्च विद्यालय जन्दाहा

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रिपोर्ट: शिशिर समीर, जन्दाहा। निर्माण के महज दो दसक के बाद से ही  विस्थापित जीवन व्यतीत करने को विवश जन्दाहा प्रखंड का एकमात्र प्रोजेक्ट कन्या उच्च विद्यालय। चार वर्षो से माँग रहीं दया की भीख, प्रशासनिक उदासीनता के शिकार हो पाँच सौ छात्राओ वाली विद्यालय में छात्राओ की संख्या पहुँची दहाई के करीब। उच्च विद्यालय के छात्रा नहीं जाना चाहती मध्य विद्यालय में आखिर कबतक विस्थापित रहेगी विद्यालय। ये सवाल छात्राओ के साथ-साथ आमलोगों की है शासन-प्रशासन से।

सरकार के द्वारा लड़कीयों के लिए चलाई जा रही तमाम योजनाओं पर कालिख पोत रही है प्रखंड का एकमात्र कन्या उच्च विद्यालय जन्दाहा की दुर्दशा। दो दशक के उम्र में ही विस्थापित जीवन व्यतीत कर रही विद्यालय। डेढ दशक से कम समय में ही विद्यालय के जर्जर भवन में पढने और पढ़ाने वालों के जिंदगी पर आ गई आफत। छत की बड़ी-बड़ी चट्टान के गिरने से दहशत में रहने लगे छात्रा और शिक्षिकाएँ कई बार तो गंभीर घायल होते-होते बचे तो कभी-कभार घायल भी होते रहें।

कभी पाँच सौ छात्राओं का भविष्य संवारने वाली विद्यालय विस्थापित होने के कारण पहुँची छात्राओं के दहाई अंक में। नौ शिक्षकों वाले विद्यालय में अब बच गये पैंसठ छात्रा। विस्थापित भी हुआ तो मध्य विद्यालय में जहाँ उच्च विद्यालय की छात्रा जाने में करते स्वयं को ग्लानि महसूस।

विद्यालय का कार्यालय कार्य हो रहा उसी विद्यालय में जहाँ छात्रा और शिक्षकों आना-जाना रहता लगा, लेकिन स्थानीय लोग विद्यालय के गेट पर ही लगाये हुए हैं गंदगी का अंबार, इतना ही नहीं विद्यालय के मुख्य द्वार को बना दिये पेशाबखाना ,जिससे विद्यालय में छात्रा प्रवेश करती नाक बंद कर, वहीं शिक्षकों को होना होता उल्टी का शिकार, सब मिलकर बोल रहे जय हो शिक्षा विभाग ,उनका भला करे नीतीश सरकार, छात्राओ का है एक ही अरमान, जरा शर्म करो हे मेहरबान, कुछ तो करो वो मेरे सरकार।

दो दशक पूर्व बालिकाओं के लिए प्रोजेक्ट हाईस्कूल की स्थापना हुई जन्दाहा प्रखंड में हुई थी। उस समय के लोगों को याद है कि  विद्यालय कहाँ पर हो ,इसके लिए उस समय के राजनीतिक दिग्गजों  में काफी खींचातान हुई थी और अंततः साढ़े  बाईस डिसमिल जमीन में दो कमरे के साथ नवनिर्मित प्रोजेक्ट कन्या विद्यालय का संचालन जन्दाहा बाजार में शुरू कर दिया गया था । शायद स्थल चयन को लेकर जन्दाहा प्रखंड का मध्य भाग और बगल में रामावतार सहाय उच्च विद्यालय के होने की सोंच रही होगी ।

सोंच के मुताबिक विद्यालय चंद समय में यौवनाकाल को प्राप्त कर ली और छात्राओं की संख्या पांच सौ से उपर हो गया । बाजार में होने के कारण कोचिंग संस्थान की भी अच्छी तादाद जन्दाहा में है और इन्हीं कारणो से छात्र-छात्राओं की पहली पसंद जन्दाहा बाजार के निकटतम दोनो विद्यालय है । छात्राओ के अधिसंख्य उपस्थिति को देखते हुए स्थानीय लोगों के आग्रह पर विधायक डाक्टर अच्युतानंदन सिंह ने कालांतर में एक शैक्षणिक कमरे का निर्माण अपने कोश से कराया।

विद्यालय में प्रेक्टिकल के समान की भी व्यवस्था है लेकिन उम्र के डेढ दशक में ही विद्यालय को भवन के घटिया निर्माण का शिकार होना पड़ा और वर्ग कक्ष के छत से बड़ी-बड़ी चट्टान टूट-टूटकर गिरने लगा जिससे कई बार छात्रा और शिक्षिका को छत के चट्टान गिरने से घायल होना पड़ा।

नतीजतन विद्यालय में पढना और पढाना जिंदगी से खिलवाड़ करने के समान हो गया । विद्यालय का शैक्षणिक महौल दहशत में परिणत हो गया । 2014 में हिन्दी शिक्षिका कुमारी अर्चना छात्राओ को पढा रही थी। तभी एक चट्टान उनके सिर के करीब गिरा। जिससे वो आंशिक रूप से घायल हुई लेकिन चट्टान उन्हें छूती हुई जिस कुर्सी पर गिरी  वो चकनाचूर हो गया।

इस घटना से विद्यालय में भगदर मच गया। वरीय पदाधिकारी को इसकी सूचना दी गई। वरीय पदाधिकारी ने तत्काल विद्यालय का निरिक्षण किया और छात्राओं का शैक्षणिक कार्य बालक मध्य विद्यालय जन्दाहा में चलाने का निर्देश दिया, यानि विद्यालय को विस्थापित कर दी गई। तब से आजतक विद्यालय विस्थापित जीवन व्यतीत कर रहीं है। लेकिन इसके विस्थापित होने का दर्द शिक्षा विभाग, सरकार के साथ-साथ हमारे जनप्रतिनिधि तक को नहीं। यदि दर्द किसी को है तो केवल छात्राओ को जो उनकी घटती संख्या में बदल गई ।

अब विद्यालय में नौ शिक्षक पर सिर्फ 63 छात्रा ही है। आखिर जहाँ सरकार छात्र के अनुपात में शिक्षक नहीं होने के चलते जलालत झेल रही है, वही विभागीय उदासीनता के कारण शिक्षकों के होते हुए छात्रों के नहीं होने से भी जलालत झेलने को भी विवश होना पड़ेगा ।
विद्यालय के शैक्षणिक कार्य को तो बालक मध्य विद्यालय जन्दाहा में सिप्ट कर दिया गया, लेकिन अन्य कार्यो के लिए शिक्षक और छात्राओं को इसी विद्यालय में आना पड़ता है । जहाँ आना-जाना स्थानीय लोगों द्वारा मुख्य द्वार पर गंदगी का अंबार लगाने एवं पेशाब करने के कारण दुश्वार हो गया है ।

विद्यालय के मुख्य द्वार पर स्थानीय लोगों ने कुड़े का अंबार लगा दिया है। बात कुड़े की ही नहीं है, बल्कि स्थानीय लोगों के साथ-साथ बाजार में खरीदारी करने वालों ने तो पेशाबखाना भी बना दिया । जल,जंगल और अवशिष्टों के दुर्गंध से विद्यालय के अन्दर प्रवेश करना मुश्किल है।

छात्रा और शिक्षक नाक को बंद कर विद्यालय के अन्दर प्रवेश करते और निकलने के वक्त भी वही करना पड़ता। लेकिन हवा के झोकों के सहारे सौच का दुर्गंध छात्रा और शिक्षको को उल्टी के शिकार बनाकर ही रहता। कई बार शिक्षक पेशाब करने वाले को रोकने का प्रयास करते, लेकिन उनकी ये प्रयास नाकाफी होता ।

लिपिक रंजन कुमार सिंह के अनुसार विद्यालय को झोला में रखकर चलाना पड़ रहा है ।जिसके चलते पदस्थापित शिक्षक और छात्राओ का भविष्य अंधकार में हैं ।उनका इशारा छात्राओ और शिक्षको के विद्यालय में रहने वाले कागजात से था, क्योंकि रखरखाव के कारण वो विलुप्त होने की संभावनाओं से गुजर रहा है । प्रधानाध्यापिका डाक्टर उषा विद्यार्थी का कहना है कि सरकार जहाँ बालिकाओं के लिए इतना कुछ कर रहीं है, उसमे थोड़ा और करने की आवश्यकता है ।उन्होंने कहा कि बालिकाओं को शिक्षा के बुलंदी पर ले जाने में सक्षम प्रबंधन संसाधन के अभाव से जुझ रहा है।

वर्ग कक्ष के बगैर शिक्षा देना संभव नहीं है और बतौर प्रधानाध्यापिका मैने शासन-प्रशासन से कितनी बार पत्रचार किया, लेकिन कोई समाधान होता नहीं दिखाई दे रहा है । उन्होंने समाजिक कार्यकर्ता और मीडिया से भी विद्यालय सहयोग की अपील की ।

समाजसेवी शिक्षाविद प्रोफेसर डीके सिंह ने सरकार के स्वच्छता अभियान पर सवाल खड़ा करते हुए विद्यालय के मुख्य द्वार पर शौच करने वाले को मानसिक दिवालियापन का शिकार बताया ।क्योंकि विद्यालय में छात्रा प्रवेश करती रहती है और उसी जगह पर लोग खुले में पेशाब करते रहते । समाजसेवी स्थानीय अवधेश कुमार निराला,विजय सिंह कुशवाहा एवं पंचायत समिति सदस्य और जन्दाहा वैश्य संघ के अध्यक्ष जितेंद्र कुमार जेपी का कहना है कि विद्यालय की दुर्दशा के लिए वैशाली प्रशासन जिम्मेवार है ।

उनके अनुसार प्रशासन विद्यालय को दुसरे विद्यालय में टैग करने के बाद सुधी लेना भी मुनासिब नहीं समझा । बतौर तत्कालीन प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी मोहम्मद सफी आलम ने बताया मुझे इसके संबंध में अधिक जानकारी नहीं है, अब जानकारी मिल रही है तो इसका निरिक्षण कर वरीय पदाधिकारी को अवगत कराया जाएगा।

विद्यालय अपनी पूर्व की स्थिति में आने के लिए व्याकुल है, लेकिन इसके व्याकुलता पर प्रशासनिक उदासीनता हावी है ।यूँ कहें कि उपेक्षा का दंश झेल रहे प्रोजेक्ट कन्या उच्च विद्यालय जन्दाहा दम तोड़ने के कगार पर खड़ी हो सरकार और सरकार के नुमाइंदे को कोशती नजर आ रही है।

वही सरकार के द्वारा छात्राओ को दी जाने वाली सभी सुविधाएँ नकारा साबित होकर कई सवाल खड़े कर रही है? सवाल उठता है कि किस तकनीक और सामग्री से बनाई गई भवन थी, जो पन्द्रह वर्षों के अन्दर ही मूर्धन्य हो गई?  आखिर सरकारी भवन का मियाद कितनी है ? किस एजेंसी ने भवन का निर्माण कराया था?  क्या भवन उचित देखभाल के कारण विध्वंस के कगार पर पहुंच गई? क्या भवन के जर्जरता से वरीय पदाधिकारी वाकिफ नहीं होते और यदि होते है तो हादसे का आमंत्रण क्यों देकर आने का बाट जोह रहे होते हैं ? छत के चट्टान गिरने से होने वाली किसी प्रकार के हादसे का कौन होता जिम्मेवार ? आखिर चार साल से विस्थापित विद्यालय का क्यों नहीं जीर्णोद्धार करने की दिशा में कार्य हुई ? क्या दूसरे विद्यालय में सम्बद्ध करने से पदाधिकारी जिम्मेवारी से मुक्त हो गए? प्रशासन की वर्तमान रवैया से आमलोगों को निराशा है ।

विद्यालय के मुख्य द्वार पर लगी गंदगी के अंबार का कौन है जिम्मेवार?  क्या यही है निर्मल पंचायत में अवस्थित विद्यालय देगा सरकार के स्वच्छता अभियान का संदेश दे पायेगी , जिसके मुख्य द्वार पर ही लोग खुले में सौच  करते हों ?

विद्यालय परिवेश, छात्रा और शिक्षको की वेदना सरकार के सोंच पर कुठाराघात है ।यदि सरकार वास्तव में बालिका समृद्धि के दिशा में संकल्पित है तो लोकलुभावन योजनाओं के बदले बुनियादी व्यवस्था को मजबूत करने के साथ-साथ निरंकुश अधिकारी पर लगाम लगाने की जरूरत है ताकि स्वास्थ्य शिक्षा प्राप्त कर स्वस्थ समाज की परिकल्पना साकार हो सके।

वर्तमान व्यवस्था में अधिकारी जिम्मेवारी को कबूल करने को तैयार नहीं दिखाई देते और जबतक इसे नही करेंगे तबतक बालिका समृद्धि की परिकल्पना को साकार नहीं किया जा सकता । बिहार में शिक्षा विभाग सबसे बूरे दौर से गुजर रहा है । हर जगह रिश्वत की गूँज सुनाई देती है । सभी एक-दूसरे को दोहन का शिकार बनाकर सरकारी विद्यालय में पढ़ने वाले बच्चों के भविष्य को कुंठित करने पर आमादा है ।

आवश्यकता है सरकार को दिवास्वप्न दिखलाने वाली सोंच में परिवर्तन करने की और हमें नीज संतान समझ कर भविष्य संवारने के लिए ठोस कदम उठाने की ताकि शिक्षित जीवन-संस्कारित जीवन, संस्कारित जीवन-समृद्ध जीवन और समृद्ध जीवन -समृद्ध राष्ट्र की परिकल्पना साकार हो सके ।

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