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सीरिया की त्रासदी को समझिए, परस्पर मत उलझिए

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आलेख: कमलेश पांडे, वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार। सीरिया में सत्तारूढ़ बशर अल असद सरकार और उनके धुर  विद्रोहियों द्वारा एक-दूसरे के खिलाफ हमला किया जाना कोई नई बात नहीं है। लेकिन जिस तरह से असद सरकार द्वारा अपने विद्रोहियों के खिलाफ रासायनिक हथियारों का प्रयोग किया गया, उससे दुनिया का थानेदार समझा जाने वाला अमेरिका और उसके मित्र देशों की बेचैनी बढ़ गई। अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस रासायनिक हमले से इतना आगबबूला हो गए कि इन देशों ने परस्पर तालमेल बिठाकर सीरिया पर 100 से अधिक मिसाइल दागे और भविष्य के लिए हिदायत दी। उधर, रूस, चीन और सीरियाई नेतृत्व भी मिसाइल हमलों के बाद से सकते में हैं और अमेरिकी गठबंधन की खुली आलोचना की है।

इन बातों से बेपरवाह अमेरिकी गठबंधन ने असद सरकार को धमकी दी है कि अगर सीरिया सरकार ने अपने नागरिकों पर फिर रासायनिक हमला किया तो हम पुनः मिसाइल हमले से उसका जवाब देंगे, क्योंकि रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल को रोकने के लिए अमेरिका और उसके मित्र देश प्रतिबद्ध हैं और दोबारा हमला करने के लिए तैयार भी। इन देशों का यह कहना कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सदस्य सीरिया में असद सरकार के खराब शासन से निबटने में विफल रहे हैं, रूस और चीन सरीखे देशों पर परोक्ष हमला है जो अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण है।

देखा जाए तो अमेरिका और उसके मित्र देशों के धुर विरोधी रूस और उसके मित्र देश- चीन व बोलीविया जिस तरह से बशर अल असद सरकार के पक्ष में खड़े हैं, उससे यह नहीं लगता कि सीरिया-संकट का समाधान इतना जल्द निकल पायेगा। क्योंकि 2011 से ही सीरिया अपने गृहयुद्ध में उलझा हुआ है, लेकिन विश्व विरादरी तमाशे देख रही है।

हैरत की बात तो यह है कि सीरिया के खिलाफ अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस के मिसाइल हमलों की निंदा करने और इसे फौरन रोके जाने की मांग करने के लिए रूस की तरफ से संयुक्त राष्ट्र में बुलाई गई आपात बैठक में रूस द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव को 15 सदस्य देशों वाली संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सिर्फ दो देशों चीन और बोलीविया का ही साथ मिला। जबकि, विपक्ष में आठ देशों ने मत दिया जिनमें अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, नीदरलैंड्स, स्वीडन, कुवैत, पोलैंड और आइवरी कोस्ट शामिल हैं। इससे स्पष्ट है कि सीरिया के रासायनिक हथियारों के ठिकानों को लक्षित कर किए जा रहे अमेरिका और उसके मित्र देशों के हवाई हमलों को जहां सुरक्षा परिषद का मत मिल गया है, वहीं रूस को उसके प्रस्ताव पर आवश्यक समर्थन नहीं मिल पाने से निकट भविष्य में उसकी सीरियाई चुनौती और बढ़ेगी ही, कम नहीं होगी।

स्वाभाविक है कि अब दुनिया के दो दबंग देशों अमेरिका और रूस तथा उनके मित्र देशों के बीच अंतरराष्ट्रीय रस्साकशी भी ज्यादा बढ़ेगी, जिससे वैश्विक कूटनीतिक माहौल भी दुष्प्रभावित होगा। इस बात में कोई दो राय नहीं कि सोवियत संघ के जमाने से ही रूस, सीरिया सरकार का साथ दे रहा है। उसके अलावा, ईरान और हिजबुल्ला भी विद्रोहियों के साथ लड़ने में असद सरकार की मदद कर रहे हैं; जबकि अमेरिका, सीरियाई गृह युद्ध के शुरू होने के बाद से ही विद्रोही संगठनों की लगातार मदद कर रहा है। फ्रांस भी 2013 से ही सीरिया के विद्रोही संगठनों को हथियार मुहैया कराता रहा है। ब्रिटेन भी 2013 में हुए रासायनिक हमले के बाद से ही सीरिया के खिलाफ है।

कहना न होगा कि सीरियाई गृह युद्ध में अबतक चार लाख लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 15 लाख लोग दिव्यांग बन चुके हैं। यही नहीं, इस भीषण गृहयुद्ध में जहां 61 लाख लोग आंतरिक रूप से विस्थापित हैं, वहीं 56 लाख सीरियाई नागरिक देश में हालात ठीक नहीं होने की वजह से विदेशों में रह रहे हैं। ऐसे में सीधा सवाल है कि यह सब किसके लिए और कबतक? क्योंकि उपरोक्त आंकड़े इस बात की चुगली कर रहे हैं कि संयुक्त राष्ट्र संघ सीरिया में मानवता की रक्षा करने में विफल रहा है!

यह भी  स्पष्ट नहीं हो पा रहा है कि सीरिया में आखिरकार किसकी दादागिरी चल रही है- अमेरिका और उसके मित्र देशों के समर्थक विद्रोहियों की, या फिर रूस और उसके मित्र देशों की समर्थक असद सरकार की? यक्ष प्रश्न यह भी है कि क्या दोनों दबंग देशों और उनके मित्र देशों की अनैतिक घींचा-तानी में सीरिया के आम अमनपसंद लोग पिस रहे हैं और उनके अंतहीन दुःखों को हरने वाला कोई नजर नहीं आता। मुझे नहीं लगता  कि इसका कोई सर्वमान्य उत्तर नहीं मिल पायेगा, क्योंकि  गृहयुद्ध अपने चरम पर हैं और देश-दुनिया के तमाम सभ्यलोग तमाशबीन बने बैठे हैं।

वैसे तो संयुक्त राष्ट्र संघ के मातहत सक्रिय रासायनिक शस्त्र निषेध संगठन (ओपीसीडब्ल्यू) के निरीक्षकों ने सीरिया के डूमा में हुए कथित रासायनिक हमले की जांच शुरू कर दी है जिसमें 70 लोगों की मौत हो गई थी। हालांकि असद सरकार ने इस हमले को झूठा और मनगढ़ंत करार दिया था। दरअसल, सीरिया के लिए रासायनिक हमले करना कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस बार अमेरिका और उसके मित्र देशों ने जितनी ततपरता दिखाते हुए सीरिया पर मिसाइल हमला बोल दिया, क्या वह उचित है? क्योंकि इन हमलों से दमिश्क के वैज्ञानिक शोध संस्थान जहां रासायनिक और जैविक हथियार बनाये जाते हैं, होम्स प्रान्त जहां इनका भंडारण किया गया था और होम्स के पास एक कमांड पोस्ट जहां इन जहरीले हथियारों के उपकरण रखे हुए थे, बुरी तरह से बर्बाद हो चुके हैं।

सच कहा जाए तो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंफ की इन बातों में भी दम है कि जिन्होंने मां, बच्चों समेत हजारों लोगों को निशाना बनाया है, वे  इंसान नहीं बल्कि शैतान हैं। ब्रिटिश प्रधानमंत्री थेरेसा का यह कहना महत्वपूर्ण कि सीरिया में सैन्य बल के इस्तेमाल के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचा था। फ्रांसीसी राष्ट्रपति एमैेनुएल मैक्रो की इन बातों में भी वजन है कि उन्होंने मई 2017 में जो लक्ष्मण रेखा खींची थी, उसे लांघा गया है। शायद यही वजह है कि आस्ट्रेलिया, जापान, न्यूजीलैंडस, नीदरलैंड्स, जर्मनी, इटली, स्पेन, तुर्की, जॉर्डन, सऊदी अरब, इजरायल समेत कई देश अमेरिकी खेमे में शामिल हैं।

जबकि रूस, ईरान और चीन ने सीरिया की असद सरकार के समर्थन में मिसाइल हमले का कड़ा प्रतिवाद किया है। रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन ने तो इस हमले को आक्रामक कृत्य करार देते हुए दो टूक कहा है कि यह हमला सीरिया में मानवीय संकट को और बढ़ाएगा जिसका अंतरराष्ट्रीय सम्बन्धों की पूरी व्यवस्था पर प्रभाव पड़ेगा। ईरान के शीर्ष नेता अयातुल्लाह अली खमैनी ने तो अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंफ, फ्रांसीसी राष्ट्रपति मैक्रो और ब्रिटिश प्रधानमंत्री थेरेसा को अपराधी तक करार दिया और कहा कि अमेरिका और उसके सहयोगियों के पास कोई सबूत नहीं है। खुद सीरियाई राष्ट्रपति बशर अल असद ने साफ कहा कि इस हमले ने प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ जवाबी संघर्ष के लिए और इच्छुक बनाया है। यह आक्रामकता सीरिया और इसके लोगों को देश में आतंकवाद को कुचलने के लिए और प्रतिबद्ध बनाएगी।

उपर्युक्त बयानों से भी स्पष्ट है कि दुनिया के देश स्पष्ट रूप से दो हिस्सों में बंट चुके हैं जो तीसरे विश्वयुद्ध को आमंत्रण देने जैसा है। ऐसे मामलों में भारत की तटस्थता विश्व विरादरी के हित में है। हमारी पुरजोर कोशिश होनी चाहिए कि सीरिया किसी की जोर आजमाइश का अखाड़ा नहीं बनने पाए। क्योंकि थोड़ी सी भी लापरवाही न केवल परमाणु हथियार सम्पन्न देशों पर, बल्कि पूरी मानवता पर भारी पड़ेगी। इसलिए सीरिया की त्रासदी को समझिए, परस्पर मत उलझिए।

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