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सवालों के घेरे में आज के बंद समर्थक

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आलेख: नितेश कुमार चौधरी। आरक्षण विरोधियों द्वारा आहुत भारत बंद सफलता के देहलीज पर खङा होने के बावजूद हिंसा और आगजनी समाज के कारण प्रबुद्धजनों को कोसती नजर आ रही हैं। वहीं राजनीतिक रोटी सेकने वाले राजनीतिक दल के दोहरे चरित्र की नकाब उतार कर चौराहे पर फेंक दिया है।

सोशल मीडिया के माध्यम से दस दिनों में दो-दो बार होने वाले भारत बंद से देश कांप गया है। कोस रहा है नीति नियंताओं के चक्रव्यूह रचने वाले को! 02अप्रैल को सौ से उपर सांसद और कई दलों के साथ -साथ विदेशी षडयंत्र के चक्रव्यूह में फँसे भोलेभाले जनता को सङकों पर उतारकर अराजकता का महौल कायम किया गया था।

नतीजन 10अप्रैल को उसी प्रतिशोध ने कहर वरपाया। सालीनता और सौम्यता का सम्पूर्ण आदर्श मर्यादाहीन हुआ। चीख, चिल्लाहट पत्थरों की चोट खाकर दवा के लिए व्याकुल हो रही थी ,तो कहीं परिवार की चिंता सता रही थी। हर तरफ त्राहीमाम मचा था। कहीं बंद समर्थक तो कही विरोधी और उन सबसे बचने के बाद पुलिस हलकान थी। आ तुझे देख लें कि स्थिति विशाल भारत के एकता और अखंडता को खंडित करने वाला षडयंत्र नजर आ रहा है ।

इन हालातों का आखिर जिम्मेवार कौन? किसने किया दोनों बंदी का आह्वान? क्या न्यायपालिका की मर्यादा इस देश में समाप्त होने की स्थिति में पहुँच गया है, या क्या न्यायपालिका से लोगों का भरोसा समाप्त हो गया? क्या देश से बङी सियासत हो गई? कौन हैं, जो उस माँ के ममता को लौटा सकता, जिसे बंदी ने छीन लिया है?

अब सवाल उठता है कि बंदी के मूल आयोजक सोशल मीडिया की बढती भूमिका कितना जायज हैं ? क्या सरकार की जिम्मेवारी नहीं है कि इसकी मानकता को मर्यादित कर जिम्मेदार मीडिया का स्वरूप प्रदान करें? क्या सरकार अभिव्यक्ति की आजादी के आर में सोशल मीडिया को नफरत फैलाने और एक-दूसरों के सम्मान को लूटने की खुली छूट दे रखी है, या क्या सरकार की इस पर कोई नियंत्रण नहीं है? ये सवाल इस बंदी को लेकर ही नहीं, बल्कि आयेदिन सोशल मीडिया के कारण होने वाली सामाजिक अशांति से भी है?

सवाल राजनीतिक दलों से भी है कि आखिर जब आपने 02अप्रैल की बंदी में अपनी चट्टी बिछा ही ली थी और किसी ने इसका प्रतिरोध नहीं किया, तो आज पुनः दूसरे को रोकने का अधिकार कहाँ से प्राप्त हुआ? कौन होते है आप दूसरे की मांग को जबरन रोकने वाले? क्या आपकी मंशा समाज व राष्ट्र में विष व्याप्त कर, टकराव पैदा कर राष्ट्रीय एकता और अखंडता को प्रभावित करने की नहीं है? आज वैसे राजनीतिक दलों को स्वतः अत्मचिंतन कर देश से क्षमा माँगने की आवश्यकता है और यदि आपने ऐसा नहीं किया तो ये देश कभी माफ नहीं करेगा, ये देश कभी माफ नहीं करेगा।

सवालों के घेरे में आज के बंद समर्थक भी है। ये सवाल इसलिए नहीं कि इन्होंने बंद क्यों किया ? बल्कि सवाल इसलिए है कि आपने 02अप्रैल के बंद समर्थक को प्राप्त अराजक सम्मान अपने नाम क्यों किया? क्या इन्हीं संस्कार और संस्कृति के बदौलत स्वयं को सवर्ण कहलाने की आहर्ता प्राप्त की है? जिस मीडिया पर आपके लिए भेदभाव का आरोप लगा, आपने उसे भी अपने कोप में लेने से नहीं छोड़ा?

दहाई की संख्या में मीडिया के लोगों को जख्मी कर कैमरा तक तोङ दिया। कहीं आने-जाने से रोका गया। क्या ये मीडिया वाले अपने काम से जा रहे थे, क्या इसके आजादी को छीनने की आजादी आपको प्राप्त है? शांतिपूर्ण बंदी आपका संवैधानिक अधिकार है, जिसका मै सम्मान करता हूँ, लेकिन दोनों बंदी में जिस तरह की अराजकता और अशांति पैदा कर खुनी खेल को जन्मित किया गया, वो घोर निंदा के योग्य हैं।

आरक्षण भारतीय परिवेश में नितांत आवश्यक है विधान है, लेकिन विधान की दुरूपयोग चिंतित करने वाला है। आखिर आरक्षण का क्या औचित्य रह जाता है, जब वो वास्तविक लोगों की आवश्यकता को पूरा करने असमर्थ दिखाई देने लगे? आरक्षण प्राप्त समाज के सम्पूर्ण विकास के उदेश्य की पूर्ति करने के लिए बनाया गया था, लेकिन क्या वो समाज ये बताने की स्थिति में है कि इसकी वास्तविक लाभ उसे मिला हो?

क्या आरक्षण चंद लोगों की बपौती और राजनीतिज्ञों की भोज्य सामाग्री बनकर नहीं रह गई? क्या जरूरतमंदो को इससे वंचित नहीं किया गया? जवाब न आपके पास है और न ही मेरे पास। कारण स्पस्ट है कि मेघा का हरणकर्ता आरक्षण आज तक खुद भूखा है।

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