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अधिकारी, जनप्रतिनिधि और सेविका का सुन्दर चारागाह बनकर रह गया आँगनवाड़ी केंद्र

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अधिकारी, जनप्रतिनिधि और सेविका का सुन्दर चारागाह बनकर रह गया आँगनवाड़ी केंद्र ! जिलाधिकारी के निर्देश पर जाँच में मिली भारी अनियमितता, लेकिन कारवाई क्या होगी, ये तो भविष्य के गर्भ में छिपा है? ??

मनमाने ढंग से चलायी जा रही है आंगनबाड़ी केंद्रों के जाँच में पहुंचे अंचलाधिकारी श्री योगेन्द्र सिंह को भी चिंता में डाल दिया ।केंद्र की संचालन व्यवस्था बच्चे को पोषित करने के बदले सेविका के साथ-साथ विभागीय पदाधिकारी को पोषित करता दिखाई दिया । किसी केंद्र पर बच्चे समानुपातिक नहीं पाये गये, वहीं किसी एक बच्चे के शरीर पर ड्रेस भी दिखाई नहीं दिया ।हैरत तो तब हुई जब अंचलाधिकारी के द्वारा जाँच के लिए माँगी गई भंडार पंजी किसी सेविका के पास उपलब्ध नहीं था ।सबने भंडार पंजी अपने पति या बच्चे के पास होने की बात बताई ।कुव्यवस्था का आलम यहीं नहीं थमा, बल्कि प्रसुति महिलाओ को दी जाने वाली टीएचआर पंजी पर लाभूक का हस्ताक्षर और निशान तो जरूर था, लेकिन किसको कितनी और किस माह व तारीख को दिया गया कहीं अंकित नजर नहीं आया ।साप्ताहिक जाँच करने की जिम्मेवारीयों का निर्वहन करने वाली प्रवेक्षिका द्वारा महिनों से केंद्र का निरिक्षण नहीं किया गया है ।

मालूम हो कि जिलाधिकारी वैशाली के आदेश पर अंचलाधिकारी को जन्दाहा प्रखंड के आठ आंगनबाड़ी केंद्रो का जाँच करना है ।जाँच कई बिंदुओं पर करना है और उसे प्राप्त अधिकारिक फार्मेट में अंकित करना है ।जाँच में सहूलियत के लिए जाँच पदाधिकारी को प्राप्त सूची में आंगनबाड़ी केंद्रों के सेविका का नाम,स्थान, संचालन समय और प्राप्त सुविधाओं को दर्शाया गया है । जिसके तहत जाँच पदाधिकारी जन्दाहा के केंद्र संख्या 224,108 और 109 पर पहुंचकर जांच किये ।

जाँच के लिए अंचलाधिकारी ने सबसे पहले केंद्र संख्या 224 के निकट एक दुकानदार से आंगनवारी के संबंध में जानकारी माँगी,तो उसने बगल में होने की बात बताई उन्होंने आँगनवाड़ी यहीं है कहते हुए केंद्र पर पहुँचे तो बोर्ड लगी गाड़ी देखकर एक महिला प्रणाम करते हुए साफ-सफाई में जूट गई ।किसी तरह एक बच्चे को भी ले आई । लेकिन बच्चे नही होने और आंगनबाड़ी नहीं खुलने की बहाने तो बाल विकास परियोजना कार्यालय के भ्रष्ट जंजीर से निकल आयेगी, परन्तु क्या टीएचआर पंजी पर केवल लाभूक का नाम अंकित कर हस्ताक्षर और निशान करा लेना अपराधिक षड्यंत्र नहीं हैं , जिस पंजीं में माह,दिनांक और लाभूक को दिये गये खाद्यान्न की मात्रा तक अंकित नहीं की गई हो , वो भी दो- माह तक? आंगनबाड़ी केंद्र भाड़े के मकान में चल रहा है, लेकिन किराया कहाँ से और कितनी मिलती है, ये किसी सेविका को मालूम नहीं हैं ?

सफर बढता हुआ केंद्र संख्या 109 पर पहुंचता हैं , जहाँ एक एनएम टीकाकरण कर रहीं मिलती है ।यहाँ पोषाहार की व्यवस्था समान्य तौर पर अच्छी थी ।बच्चे को पोषाहार में पुलाव की व्यवस्था थी । अमूमन ठंड के लिसाजा बच्चे औसतन तो थे,लेकिन ड्रेस विहीन ।देखने से लग रहा था कि जाँच टीम आने की जानकारी पहले से ही थी,जिसकी तैयारी सेविका ने पहले से कर रखी हो ।लेकिन चोरी की अस्त्र यहाँ भी पस्त हो गया और मेरे मुँह से निकल पड़ा “हाय रे भंडार पंजी ” ।चलिए थोड़ा आगे केंद्र संख्या 108 अवस्थित हैं ।पाँच -सात बच्चे की टोली लिए सेविका पूरी तैयारी में जुटी थी ।लगता था कि शायद यहाँ पर भी आने की जानकारी मिल गयी है ।लेकिन तैयारी की पूर्व आदत नहीं होने के चलते आधे-अधूरे रह गई ।बच्चे तो किसी तरह इकाई से दहाई गिना ली, लेकिन पोषाहार नही बनाने की कलई ने बच्चे को कुपोषित करने की पोल खोल दी ।मिडिया को देखकर अंचलाधिकारी ने दस बच्चे के लायक पोषाहार तो बता दिया, लेकिन वास्तविकता कभी नहीं देने के आदत को दर्शा रहीं थी ।यहाँ भी भाड़े के मकान, सोचालय विहीन मकान, भाड़े का अता-पता नहीं,बच्चे को ड्रेस नदारद और भंडार पंजी की बात तो लगता है करना ही बेकार की बात है ।संसाधन विहीन, आदत विहीन, श्रम विहीन,श्रद्धा विहीन परिवेश पूर्ण व्यवस्था में बच्चे कैसे होंगे पोषित और गर्भवती महिला को कैसे मिलेगी कुपोषण से मुक्ति ? ये वैसा आश्चर्य है, जो सरकार के करोड़ों खर्च कर कुपोषण से मुक्ति के दावे का हवा निकालती दिखाई दे रहा है ।

आमलोगों की माने तो पैंतीस सौ रूपये मिलने वाली सेविका को पोषाहार के रूप मे साढ़े सोलह हजार रुपये मिलते है ।इस राशि में से मोटी रकम कमीशन के रूप में बाल विकास परियोजना कार्यालय को जाता है, जिसमें से स्थानीय प्रतिनिधि सहित वरीय पदाधिकारी का शेयर बँटा होता है और यहीं वजह है कि लाख शिकायतों के बाद कोई कार्रवाई नहीं होती ।ऐसे भी आँगनवाड़ी केंद्र के देखा जाये तो दस से बीस प्रतिशत केंद्र ही खुलते मिलेंगा नहीं तो हर केंद्र मुहर्रम और ईद के मौके पर ही इबादत करते नजर आयेंगे ।ऐसा इसलिए भी होता है कि पैंतीस सौ के मानदेय राशि प्राप्त करने वाली सेविका पति या पुत्र को साझेदारी करके चलना पड़ता है ।अक्सर आँगनवाड़ी सेविका से आनेवाले काम के लिए लोगों को उसके पतिदेव या पुत्रदेव से ही संपर्क करना पड़ता है ।

बतौर अंचलाधिकारी योगेंद्र सिंह आँगनवाड़ी केंद्रों की व्यवस्था काफी चिंताजनक है ।इन्हें न तो पंजी संधारण का प्रशिक्षण दिया गया और न ही प्रवेक्षिका द्वारा नियमित रूप से केंद्र का निरिक्षण किया गया है ।उन्होंने टीएचआर पंजी पर बगैर माह,तिथि और मात्रा अंकित किए हस्ताक्षर और निशान लेने के मामले को गंभीर मामला बताया है ।

स्वतंत्र विचारक के रूप से यदि आंगनबाड़ी केंद्रो का विश्लेषण किया जाये तो यह व्यवस्था अधिकारी, कर्मचारी, सेविका के साथ-साथ जनप्रतिनिधियों का सुन्दर चारागाह है, जिसमें सरकारी राशि का कुपोषण मुक्ति के नाम पर जमकर लूट मचा हैं ।आवश्यकता है इस भ्रष्ट व्यवस्था में व्यापक सुधार की ताकि बच्चे के साथ-साथ गर्भवती महिलाओ को कुपोषण से मुक्ति मिल सकें ।
05-01-2018
समय 12-02 बजे दिन
नितेश कुमार चौधरी ।

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