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राजनीति की तीक्रमी चक्की में क्यों पिसी जा रही हैं मासूमों की जिंदगी

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आलेख: नितेश कुमार चौधरी । राजनीति की तीक्रमी चक्की में क्यों पिसी जा रही हैं मासूमों की जिंदगी! आखिर क्या कह दिया सुप्रीम कोर्ट ने जिसके लिए जिन हाँथो में कलम और किताबें होनी चाहिए थी, उनमें लाठी और डंडे थमा दी गई।

यही तो कहा है सुप्रीम कोर्ट ने –“उच्चतम न्यायालय ने sc/st act को शून्य घोषित नहीं किया है।सिर्फ इतना कहा है कि इस ऐक्ट के अन्दर किसी सरकारी अधिकारी या कर्मचारी के विरुद्ध कार्रवाई करने के पहले अभियोजन की स्वीकृति प्राप्त करना आवश्यक होगा।इस ऐक्ट के दुरूपयोग को देखते हुए क्या यह उच्चतम न्यायालय का निर्णय गलत है । नहीं।फिर भी वोट बैंक के कारण सभी राजनीतिक दल उच्चतम न्यायालय के विरुद्ध हो हल्ला मचाये हुए हैं”।

आखिर कबतक मेरा समाज आरक्षण रूपी नपुंसक आर्क से सुसंस्कृति उच्च मानकत्ता को प्राप्त करने की कोढी सोच पालते रहेगी ?आखिर कबतक पढाई के बगैर विद्वत्ता की परिकल्पना की जायेगी, कबतक शिक्षा से अभिवंचित रहेगा समाज और चढती रहेगी राजनीतिक स्वार्थीयों के स्वार्थ पूर्ती की भेंट ? ये सवाल एक इमानदार आत्मा में हलचल पैदा करती हैं।

ये इसलिए नहीं कि वर्ग विशेष की वेदी की हवन सामग्री नहीं है, बल्कि इसलिए कि सैंकङो साल के गुलामी से मुक्त होने के बावजूद भी हम आज तक मुक्त नहीं हो सकें हैं। कौन है जिम्मेवार और कौन ये जिम्मेवारी लेने को है तैयार? क्या कभी आपने सोंचा है? बिल्कुल नहीं! आखिर सोचते भी क्यों, जिंदगी तो गुजर जा रही और आने वाले पीढ़ी की भी तो गुजर जायेगी। शर्म होना चाहिए आपको और शर्म होना चाहिए उन्हें, जिन्होंने आपको इस मुहिम में चुल्हा -चौकी बंद सम्मिलित होने के लिए प्रेरित किया।

क्या कभी आपके बच्चे आज विद्यालय नहीं गए, उन्हें किताब, कॉपी और कलम है या नहीं ,विद्यालय में शिक्षक ने क्या पढाया, ट्यूसन की फीस देने में कोई परेशानी तो नहीं हो रही है, इसकी भी पङताल करने पहुँचा ? आपका जवाब बङा हास्यस्पद है, नहीं कोई तो नहीं आये हैं आजतक। जब बच्चे कहाँ है इसकी जानकारी लेने का प्रयास किया जाता है तो तपाक से जवाब हाजिर करते हैं “कौनो गाछी-वृक्षी में गेल होतई ,जरना पानी इकठ्ठा करे” ।

आखिर कितना बेशर्म हो गया है मेरा समाज, जिसमें पढाई कि चिंता किये वेगैर नौकरी की चिंता पल रही हैं। कभी अपनी इमानदार आत्मा से जिम्मेवारीयों का आंकलन कीजिएगया, तो स्वयं में लज्जित होना पङेग और ये एक ऐसी लज्जा है जिससे महा लज्जा भी लज्जित हो जाती हैं।

आखिर कहाँ है हमारी सरकार, राजनीतिक दल, कार्यकर्ता और न्यायलय, जो कभी विचार करता कि परीक्षा के वक्त तक किताब नदारद क्यों? क्या पढेंगे बच्चे और क्या लिखेंगे परीक्षा में? आखिर क्यों नहीं इस मुद्दे को लेकर सङक पर उतरता जनसैलाव? क्या आपमें कभी इसके लिए चुल्हा -चौकी बंद कर हाथों में लाठी-डंडे लेकर सङक पर उतरने की समझ नहीं पनपी ? बिल्कुल नहीं, क्योंकि हम गुलाम मानसिकता के शिकार जो हो चुके हैं।
ये मेरे सफर के साथी, हमसब राजनीति के कत्लखाने में कैद होकर अपने ही भविष्य का संघार कर रहे हैं। जहाँ विरासत की वेदी पर भविष्य का हवन हो रहा है और इस कुण्ड से निकलने वाली प्रपंची सुगंध प्रलोभित करते हुए तर्पण का रस्म अदायगी कर हमें नासमझ की झोली में कैद सा किये हुए हैं।

वास्तव में हमें बाबा साहब भीम राव अंबेदकर, महात्मा फूले, संत रविदास के प्रति सच्ची श्रद्धा समर्पित करने की अभिलाष है तो शिक्षा के संस्कार को प्लवित करना होगा। वही नहीं हम तब तक आजाद भारत के गुलाम नागरिक बने रहेंगे, जबतक कि उच्च शिक्षा के तपस्थली से राजनीतिक साजिशकर्ता ,जो हमें अशिक्षित रखकर आरक्षण की कोढी काया का लुभावन दृश्य अवलोकित करा रहे हैं, उनका शिक्षा के वेदी पर दफन न कर देंगे।

( इस संभावना की प्रबलता काफी तिव्र है कि ये मेरा आखिरी आलेख हो, इसलिए जिन्हें भी हमारी आत्मिक अभिव्यक्ति से भावनात्मक ठेस पहुँच रही होगी, उनसे क्षमा चाहूंगा। हमारी अभिव्यक्ति अपने भविष्य के हो रही असामयिक मौत से पीङित है )

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