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प्रमुख हत्याकांड का खुलासे के बाद भी पुलिस प्रशासन शक के घेरे में

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नितेश कुमार चौधरी, जन्दाहा । हत्याकांड का खुलासा होते पुलिस के कार्यशैली पर सवाल उठना जन्दाहा में राजनीतिक अंत की कहानियां लिखती दिखाई दे रही है । जिसकी आत्मीय पङताल पुलिस तंत्र, राज सत्ता के नुमाइंदे और पीङित पक्ष को भी करने की आवश्यकता है । पीङितों का सवाल न्याय के प्रति हताश भावना का प्रकटीकरण है । जिसके मूल में प्रशासन के निर्णयिक द्वंदता का होना है,जो नि:संदेह पीङितों को विश्वास नहीं दिला सकता ।

सर्वप्रथम तो प्रशासन धन्यवाद का पात्र है,जिसने इस जघन्य हत्या के बाद उत्पन्न विभत्स परिस्थितियों से बाहर निकलते हुए हत्या के कारण और हत्यारों की पहचान कर पाँच आरोपियों को जेल तक पहुँचाने में कामयाब रही । पुलिस तत्परता के चलते ही निचले स्तर के सभी अपराधियों की पहचान हो पाई ।हलांकि कारवाई के खुलासा करते वक्त प्रशासन थोड़ी जल्दबाजी में दिखाई दिया, जो पीङित पक्ष के संशय का कारण बनकर उभरा है ।जबकि प्रशासन के जिम्मेवारियों में पीङित पक्ष को न्याय के प्रति भरोसा दिलाना निहित है । इसी संशय के दूर नहीं होने के कारण ही शायद पीङित परिवार सीबीआई जांच की मांग की हो और नहीं होने की स्थिति में मृतक मनीष के शहादत स्थल पर भूखे प्यासे मर जाने की घोषणा किया हो ।

हत्याकांड की गुत्थी सुलझाने में स्थानीय पुलिस के साथ-साथ गठित टीम ने कारवाई को बेहद गोपनीय रखकर सटीक निशाना लगाया,जो पुलिस के काबिलियत को दर्शाता ।लेकिन कुछ अहम सवाल छूट गए ।आखिर इतनी बड़ी राजनीतिक हत्या का मुख्य सरगना किताब के दुकान से स्कूल और फिर बैसाखी का प्रमुख बनने वाला जयशंकर चौधरी कैसे हो सकता ?आखिर प्रखंड के किसी कर्मी से अपनी काम नहीं कराने वाला दमबाज शिक्षक नियोजन जैसी जटिल चक्र को कैसे अंजाम देने लगा ? आखिर किनके बदौलत वो क्षेत्र के नौजवानों से करोड़ों की उगाही करने में कामयाब रहा ? आखिर किसके संरक्षण में शांति की स्थली जन्दाहा के सीने पर गोलियों की बछौर हुई ? आखिर किन हालात और संबैधानिक अधिकारों का उपयोग करते हुए अधिकारी ने अपने आवास पर चर्चा करने के लिए बुलाया और लावारिस की तरह पुनः भेज दिया ? जब सरकार ने 2013 में ही शिक्षक नियोजन की प्रक्रिया बंद कर दी, तो ये अधिकारी और जनप्रतिनिधि किस सर्कुलर का उपयोग कर रहे थे ? आखिर जब शिक्षक नियोजन ही प्रमुख मनीष साहनी हत्याकांड का कारण है, तो क्यों नहीं नियोजन की सभी कागजातें जप्त किया गया ? इस तरह की अनंत सवाल पीङित पक्षों के साथ-साथ जन्दाहा के आम-अवाम को प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल खङा करने का मौका दे रही हैं । जिसपर न्याय के प्रति अविश्वासी होने के कागार पर पहुंचे आम नागरिक को भरोसा दिलाने की आवश्यकता है ।

जहां तक मुझे लगता है कि शायद प्रशासन जल्दबाजी में थी ,जिसका मूल कारण हत्या के बाद उत्पन्न परिस्थिति रही होगी । मैंने इससे पूर्व भी कहा है कि घटना के वाद आक्रोशित घटना न्याय को कुचलने का कारण बनता है । 13अगस्त का दोपहर जहां अपराधी और षंडयंत्रकारीयों का रहा, वहीं संध्या आक्रोशित और पुलिस के नाम और दोनों ने जन्दाहा को शर्मशार किया ।घटना के बाद आक्रोश स्वभाविक है,लेकिन उन आक्रोशों को कभी भी जायज नहीं ठहराया जा सकता, जो स्यंव के न्याय का कत्ल कर रहा हो ।घटना प्रखंड मुख्यालय पर होती हैं और जला पुलिस थाने को दिया जाये । ये निश्चित रूप से प्रशासन के आक्रोश की आङ में सुनियोजित नक्सली हमले की साजिश के दावे को बल प्रदान करती है । इसकी पुनर्वृति नहीं हो, शायद इसके लिए ही जल्दबाजी में हत्याकांड का खुलासा किया गया हो ।

वैशाली प्रशासन ने सरकार को जो रिपोर्ट सौंपी है,उसमें नक्सली हमले की पूर्व से मिल रही सूचना का जिक्र किया गया है ।प्रशासन के दावे को झूठलाया तो नहीं सकता, लेकिन दावे की सत्यता सवालों के घेरे से बाहर भी निकलती नहीं दिखाई देती । आखिर जब क्षेत्र में नक्सल गतिविधि जारी है, तो आखिर किन परिस्थितियों में वैशाली जिले के किसी थाने में “पुलिस मित्र” बहाली नहीं की गई ।आखिर क्यों नहीं भारत सरकार के राशि पर बहाल होने वाले पुलिस के सूचक का चयन जिला प्रशासन आज तक कर सकी ? जिसके लिए कई बार गृहमंत्रालय ने रिमाइंडर भी भेजा ।सूत्रों की माने तो प्रशासन निरंकुश व्यवस्था के व्यवधान से बचने के लिए ही इस तरह का काम करती है । पीङित पक्ष का न्यायालय के द्वार खटखटाना ही सरकार को सौंपी गई प्रशासनिक रिपोर्ट है।

पीङितों के प्रति हमदर्द लोगों का भयंकर समुह खङी है,जहां वो भावुक मन समर्पित कर न्याय की उम्मीद करता ।लेकिन परिस्थितियों का लाभ लेने से जब अपने नहीं चुकते तो आमलोगों क्या करेंगे,जिसका अंदाजा लगाने की भी जरूरत नहीं है ? लेकिन विपत्ति के सागर का मजबूत पतवार साहस और संयम की गोद में फुदकती “विवेक” है ,जो लङखरा न जाये इसका ख्याल रखना चाहिए । घटना का पुलिस उद्भेदन संतोषप्रद होने के साथ-साथ प्रारंभिक है । पुलिस ने नीचले स्तर के वास्तविक आरोपियों को ढुँढने में कामयाब रही हैं ।इसलिए उसे आरोपित करने के वजाय घटना के कारणों के मुख्य सरगना को ढुँढने के लिए कहा जाना चाहिए ।चुकि ये धुर्व सत्य है कि जन्दाहा के इतिहास को बदलने का तरकीब इन छोटे आरोपियों के बदौलत नहीं संभव है । ये घटना केवल हत्या ही नहीं है, बल्कि जन्दाहा में निरंकुश नग्न सत्ता सुख भोगने का बहुत बङा षड्यंत्र है,जिसमें बङे-बङे षङयंत्रकारीयों सहित सैंकड़ों अपराध के कठमुल्ला संलग्न हो सकते है । इसलिए इस घटना का शुक्ष्म तहकीकात चाहिए । जो संसाधनविहीन पुलिस तंत्र से संभव नहीं है।

प्रमुख हत्याकांड के वाद सङकों पर छाई सन्नाटा भय के बातावरण को साबित करने के लिए काफी है । आमलोग को छोङ भी दें ,तो सरकारी पदाधिकारी और कर्मचारी भी भयकंपित है ।बतौर अंचलाधिकारी योगेंद्र सिंह “इस तरह दिनदहाड़े प्रखंड परिसर में हुई हत्या ने मुझे भी हीला कर रख दिया है और हम खुद को भयभीत महसूस करते हैं “! उन्होंने कहा कि जिला से स्पेशल पुलिस की मांग किया गया है, लेकिन अभी तक नहीं मिला है । प्रधान सहायक प्रखंड महेश्वर राय की माने तो वो किसी तरह भयभीत होकर कार्यालय का काम निपटाने आते, लेकिन अंदर से शरीर में सिहरन होते रहता है कि कहीं कोई शरीर पर गोलियाँ न चला दे ।उन्होंने कहा कहां लगता है अब आरटीपीएस काउंटर पर लाईन, जबकि पहले लम्बी-लम्बी लाईनें लगती थी।

इन सभी दृश्यों और तथ्यों के वाद सरकार को गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है कि जहां भयकंपित महौल कायम होगा, वहां पर विकास की कथा सिर्फ व सिर्फ कागजों पर लिखी जायेगी ।नतीजन समाज समाजीक रूपता से विलग होकर असमाजिक परिवेश में चला जायेगा । जिसका गंभीर परिणाम आने वाली पीढी को भुगतना पड़ सकता है ।इसलिए सरकार को सत्ता के लोभ से इतर होकर समाजीक उत्तदायित्वों के प्रति प्रभावी होना चाहिए ।पुलिस तंत्र को प्रभावी, साधन सम्पन्न और सत्ता दबाव से मुक्त करते हुए न्याय के प्रति जिम्मेवार बनाया जाना चाहिए ।

नितेश कुमार चौधरी, जन्दाहा । हत्याकांड का खुलासा होते पुलिस के कार्यशैली पर सवाल उठना जन्दाहा में राजनीतिक अंत की कहानियां लिखती दिखाई दे रही है । जिसकी आत्मीय पङताल पुलिस तंत्र, राज सत्ता के नुमाइंदे और पीङित पक्ष को भी करने की आवश्यकता है । पीङितों का सवाल न्याय के प्रति हताश भावना का प्रकटीकरण है । जिसके मूल में प्रशासन के निर्णयिक द्वंदता का होना है,जो नि:संदेह पीङितों को विश्वास नहीं दिला सकता । सर्वप्रथम तो प्रशासन धन्यवाद का पात्र है,जिसने इस जघन्य हत्या के बाद उत्पन्न विभत्स परिस्थितियों से बाहर निकलते हुए हत्या के कारण और हत्यारों की…

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