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बीजेपी की भूलभुलैय्या का चुनावी लाभ उठा रही कांग्रेस

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आलेख: कमलेश पांडे, वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार। केंद्र व अधिकांश राज्यों में सत्तारूढ़ हो चुकी बीजेपी भले ही शेष राज्यों में भी अपना पांव पसार रही हो, वहां उसके सत्तारूढ़ होने या प्रमुख विपक्षी दल बनने के आसार भी अधिक हों,  लेकिन जिस तरह से कांग्रेस उसके पुराने वर्चस्व वाले राज्यों यथा- गुजराज, राजस्थान, मध्यप्रदेश में सेंध लगा रही है, उससे बीजेपी हतप्रभ है। यूं तो कई दफे केंद्र में, इन राज्यों में भी बीजेपी ही सत्तारूढ़ है जिससे एंटी इनकंबेंसी फैक्टर से इंकार नहीं किया जा सकता। फिर भी खिसकते जनाधार के बीच जिस तरह से कुछेक लोस-विस सीटें उसे कांग्रेस के हाथों गंवानी पड़ रही है, उससे कतिपय सवाल उठना लाजिमी है।

वह भी तब, जब उसका सीधा लाभ उसकी मुख्य प्रतिस्पर्द्धी पार्टी कांग्रेस या फिर कथित धर्मनिरपेक्ष दल उठा रहे हों। पश्चिम बंगाल, राजस्थान इसका ताजा उदाहरण है। इस बात में कोई शक नहीं कि ये दल एकजुट होकर निकट भविष्य में बीजेपी के समक्ष सियासी परेशानियों का सबब बन सकते हैं। फिलवक्त जिस तरह से कांग्रेस के नेतृत्व में 17 पार्टियां गोलबंद हो चुकी  हैं, उससे भी इस बात को बल मिलता है।

गौरतलब है कि मिशन 2019 से पहले, फिलवक्त पूर्वोत्तर के तीन राज्यों में चुनाव हो रहे हैं और पांच अन्य राज्यों में भी इसी वर्ष होने वाले हैं, जिसे भारतीय राजनीति में मिनी आम चुनाव करार दिया जाता है। इसीलिये विपक्ष गोलबंद हो रहा है और कांग्रेस को मुखिया मान रहा है, क्योंकि लगभग सभी राज्यों में धराशायी विपक्ष के बीच काँग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ही मोदी के खिलाफ सर्वाधिक मुखर नेता के तौर पर उभरे हैं, जो रह रह कर मोदी सरकार पर गहरा चोट भी कर रहे हैं। अब विपक्ष भी इससे इनकार नहीं कर रहा है।

लिहाजा राजस्थान व पश्चिम बंगाल में हुई समसामयिक हार-जीत के गहरे राजनैतिक मायने निकाले जा रहे हैं, जो एक ओर बीजेपी को चेतने की नसीहत दे रहे हैं, तो दूसरी ओर कांग्रेस को झूमने नाचने का एक और मौका। निःसंदेह, राजस्थान व पश्चिम बंगाल की कुल तीन लोकसभा सीटों तथा दो विधान सीटों पर हुए उपचुनावों के नतीजे बीजेपी के लिये चिंता का सबब बन चुके हैं। जिस तरह से यहां की दोनों लोकसभा सीटें वह कांग्रेस के हाथों गंवा चुकी है, और एक अन्य विधान सभा सीट पर भी उसको काँग्रेस के हाथों ही मुंहकी खानी पड़ी है, वह कोई सामान्य बात नहीं है। क्योंकि विगत विधानसभा चुनाव और उसके बाद हुए लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने यहां पर काँग्रेस का सुफड़ा साफ कर दिया था। लेकिन हालिया जीत से कांग्रेस के नवजीवन मिलने के संकेत मिल रहे हैं।

बीजेपी के लिये सुकून की बात सिर्फ इतनी है कि पश्चिम बंगाल की एक लोकसभा सीट और एक विधान सभा सीट को वह भले ही स्थानीय सत्ताधारी दल तृणमूल कांग्रेस से नहीं झटक पाई, जिससे तृणमूल कांग्रेस ने दोनों सीटें जीत ली। लेकिन बीजेपी  जिस तरह से उन दोनों सीटों पर माकपा को तीसरे स्थान पर धकेल कर खुद दूसरे स्थान पर काबिज हो गई, वह माकपा के लिये कड़ा झटका है। वह भी तब, जब अपने अंतिम गढ़ त्रिपुरा को बचाने के लिये माकपा संघर्षरत है और बीजेपी वहां भी उसे कड़ी चुनावी टक्कर देकर सत्ता उससे छिनती प्रतीत हो रही है।

दिलचस्प है कि कुछ माह पहले ही गुजरात विस चुनाव के दौरान कांग्रेस जितनी मजबूती से प्रमुख विपक्षी दल के तौर पर फिर से उभरी और अब राजस्थान उपचुनाव में बीजेपी को करारा शिकस्त दी, उससे वह गहन आत्मचिंतन करने को मजबूर है, क्योंकि दोनों ही पड़ोसी राज्य हैं, जो पड़ोसी मध्यप्रदेश को भी प्रभावित कर सकते हैं, क्योंकि वहां भी इसी वर्ष चुनाव होंगे।कोढ़ में खाज यह कि आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र और बिहार में चुनाव नहीं है, लेकिन वहां से जुड़े बीजेपी के गंठबन्धन साथियों की फितरतों से भी विपक्षी उत्साह को बल मिला है, जो बीजेपी के लिये चिंता की नई बात है।

दो टूक कहा जाए तो संघ ‘नियंत्रित’ बीजेपी में सरकार और संगठन में सब कुछ ठीक ठाक नहीं चल रहा है, जिसे अविलम्ब दुरुस्त करने की जरूरत है। कहना न होगा कि गुजरात के बाद राजस्थान में भी इसके संकेत मिले हैं, क्योंकि उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि कोई भी उपचुनाव सत्ताधारी दल प्रायः कम ही हारता है, और जब भी हारता है तो वह उसके लिये खतरे की घण्टी होती है। सच कहा जाये तो मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया की राजनैतिक हठधर्मिता से भी राजस्थान बीजेपी की परेशानी बढ़ी है, जो कि हार की एक बड़ी वजह बनी है।

इसके अलावा, विहिप के कार्यवाहक अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष प्रवीण तोगड़िया की अचानक राजस्थान पुलिस द्वारा की गई तलाश और पदमावत फ़िल्म विवाद पर बीजेपी के ऊपरी नेतृत्व की मिलीभगत से भी जातिविशेष की करनी सेना समेत हिंदुओं के बड़े वर्ग में पैदा हुए जनाक्रोश का भी यह तात्कालिक साइड इफ़ेक्ट माना जा रहा है। यही नहीं, जिस तरह से दिल्ली में सार्वजनिक तौर पर एक बीजेपी सांसद द्वारा मनुस्मृति को समारोहपूर्वक फूंका गया, मनुवाद की आलोचना की गई, लेकिन बीजेपी चुप्पी साधे रही। उससे भी संघ-बीजेपी के इस धूर समर्थक वर्ग में निराशा घर कर चुकी है। इसके अलावा, आरक्षण उन्मूलन पर भी संघ-बीजेपी की दोहरी चाल से भी सवर्ण युवक ठगा सा महसूस कर रहे हैं।

दरअसल, बीजेपी के लिये दुविधाजनक स्थिति यह है कि जिन दलितों-पिछड़ों को अपनी ओर लुभाने के लिये वह सवर्णों से जुड़े कतिपय विरोधाभासी मामलों में रणनीतिक चुप्पी साध लेती है, उससे सवर्ण समाज ठगा सा महसूस कर रहा है। दूसरी ओर, कांग्रेस व समाजवादी दलों का परंपरागत वोट बैंक समझा जाने वाला दलित-पिछड़ा वोट बैंक अभी भी बीजेपी की तरफ पूरी निष्ठा से शिफ्ट नहीं हुआ है, कुछेक अपवादों को छोड़कर। इससे बीजेपी भी ठगी की ठगी रह जाती है। यही नहीं, हिंदुत्व समर्थक बीजेपी से अल्पसंख्यक विशेषकर मुस्लिम मतदाता शुरू से ही नाराज रहते आये हैं, जिन्हें मनाने को वह अब भी प्रयत्नशील है, लेकिन उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिलने से विपक्ष को अनायास ही मजबूती मिल जाती है।

यहां स्पष्ट कर दें कि ये तमाम नजीरें देने का मतलब बीजेपी की कमियां और कांग्रेस की खूबियां गिनना-गिनवाना नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति के उन राजनैतिक ट्रेंड की ओर इशारा करना है, जिससे निजात पाना बेहद जरूरी है और इसके लिये उन गम्भीर सियासी प्रचलनों की बारीकियों को न केवल समझना होगा, बल्कि व्यापक जनहित-राष्ट्रहित के लिये उन पर चोट भी करना होगा। वो भी छिटपुट नहीं, समवेत रूप से।

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