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मन की बात वाणीश्री के साथ

जम्मू-कश्मीर में सेना विरोधी पत्थरबाजी-प्राथमिकी आखिर क्यों?

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तीखी बात/कमलेश पांडे, वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार। जम्मू-कश्मीर में कभी आतंकवादियों की ओर से अचानक होने   वाली गोलीबारी, तो कभी उन्हें शह देने वाले स्थानीय लोगों की तरफ से अकस्मात की जाने वाली पत्थरबाजी से अभिशप्त भारतीय सुरक्षा बलों और अमनपसंद लोगों को उस वक्त जरूर गहरा धक्का लगा, जब जम्मू-कश्मीर के शोपियां जिले के कोतवाली थाने में भारतीय सैनिकों के खिलाफ न केवल एफआईआर (संख्या 26/2018) दर्ज की गई, बल्कि उसमें हत्या, हत्या के प्रयास एवं जीवन को खतरे में डालने जैसी संगीन व षड्यंत्रकारी धाराएं भी लगाई गई।

यहाँ स्पष्ट कर दें कि जम्मू-कश्मीर में भारतीय दंड संहिता की बजाय उसके अपने कानूनी प्रावधान लागू होते हैं। शायद यही वजह है कि भारतीय सेना ने भी उपद्रवियों के खिलाफ काउंटर एफआईआर दर्ज करवाई है। साथ ही इस मामले में राज्य सरकार की भूमिका पर कड़ा एतराज भी जताया है, जिसका अपना महत्व है। इस बात की उम्मीद भी जगी है कि अब राज्य प्रशासन अब सूझबूझ से काम लेगा।

कहना न होगा कि ऐसा करते वक्त भी जम्मू-कश्मीर पुलिस इस तल्ख सच्चाई से जरूर वाकिफ रही होगी कि शोपियां में दर्जनों उग्र लड़कों ने वहां से गुजर रहे सैन्य काफिले के वाहनों में मुश्तैद जवानों के ऊपर निशाने साधते हुए न केवल पत्थरबाज़ी की, बल्कि उनके हथियार छीनने की कोशिशें और छिटपुट गोलीबारी भी की। जिससे भयभीत सैनिकों ने जब आत्मरक्षार्थ जवाबी फायरिंग की, तो दो लड़के मारे गए, कुछ अन्य घायल हुए। इसमें सेना के कतिपय जवानों को भी चोटें आईं।

लिहाजा, सीधा सवाल है कि आखिरकार सेना के खिलाफ की गई पत्थरबाजी से उपजे हालात पर आत्मरक्षार्थ चलाई गई गोलियों से हुई मौतों के विरुद्ध 10 गढ़वाल इकाई के सैन्य कर्मियों के खिलाफ स्थानीय थाने में प्राथमिकी क्यों दर्ज की गई? आखिर किसे खुश करने के लिए यह सब किया गया, जबकि सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (अफ्सपा) जम्मू-कश्मीर में भी लागू होता है? और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि किसकी सरकार में यह सबकुछ हो रहा है, जरा खुद सोचिये। क्योंकि पीडीपी-बीजेपी की गठबंधन सरकार वहां सत्तारूढ़ है।

यही नहीं, अब तो हर किसी के जेहन में यह सवाल भी उभर  रहा है कि क्या अलगाववादियों की कथित समर्थक पार्टी पीडीपी और राष्ट्रवादियों की मुखर पार्टी बीजेपी के बीच हुए सत्तालोलुप विरोधाभाषी गठबंधन का राजनैतिक हित भी गठबंधन और सत्ता के इसी सांप-छुछुन्दर के खेल में निहित है?या फिर माकूल अवसर मिलने पर ‘मोदी मैजिक’ कोई नया करिश्मा दिखायेगा और अकस्मात वहां राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया जाएगा, बनते-बिगड़ते हालात के मद्देनजर! कुछ कहना जल्दबाजी होगी।

बेशक बदलते राजनैतिक वक्त, प्रशासनिक हालात का तकाजा है कि लोकतांत्रिक राजनीति में जनप्रशासन के कतिपय ऐसे कमजोर पहलूओं के परिप्रेक्ष्य में जनता की आम राय कायम करने हेतु देशवासियों विशेषकर जम्मू-कश्मीर के लोगों को यह बात खुद समझने और दूसरों को समझने की जरूरत है कि आखिरकार हमारी अदूरदर्शी व सत्तास्वार्थी राजनीति स्थानीय प्रशासन को किस ओर ले जा रही है, और उसके कितने भयावह परिणाम हो सकते हैं!

दो टूक कहें तो गाहे बगाहे ऐसे भयावह परिणाम सामने भी आ  रहे हैं, न सिर्फ जम्मू-कश्मीर में बल्कि अन्य सूबों में भी। इसलिये बेहतर यही होगा कि समय रहते ही सबलोग सावधान हो जाएं। मिलजुलकर कतिपय कानूनी छिद्रों को या तो भरा जाय, या फिर उन्हें विलोपित करके समग्र राष्ट्रीय हितों के मद्देनजर कोई वैकल्पिक नया कानून लाया जाए, जो सबको पसन्द हो या न हो, लेकिन जनहित-राष्ट्रहित साधने और उसे बढ़ाने वाला हो। शायद किसी भी विषय पर अध्यादेश लाकर कानून बनाने, उसे लागू करने का संवैधानिक प्रावधान कुछ ऐसी ही विडम्बनापूर्ण स्थितियों-परिस्थितियों से निबटने के मद्देनजर किया गया होगा, जिसे न केवल समझने बल्कि उसपर अमल करने की जरूरत है।

ऐसा इसलिये कि मुस्लिम बहुल जम्मू-कश्मीर में स्थिति बहुत ही विस्फोटक होती जा रही है। एक तरफ अंतरराष्ट्रीय सीमा पर हिन्दू बहुल गांवों और सैन्य चौकियों को निशाने बनाकर पाक सैनिकों द्वारा लगातार नापाक फायरिंग की जा रही है, तो दूसरी तरफ सीमा के अंदर घुस आए पाकिस्तान प्रोत्साहित आतंकवादियों-घुसपैठियों के विरुद्ध जब भी भारतीय सुरक्षाबलों द्वारा ‘सर्च और उन्मूलन अभियान’ चलाये जाते हैं, या ऐसी कोई अन्य गतिविधि चलती है तो उससे बौखलाए स्थानीय आतंकी समर्थक तत्वों द्वारा जनसंघर्ष की आड़ लेकर सैनिकों पर ही पत्थरबाजी, गोलीबारी की जाती है, जिससे उत्प्न्न विरोधाभासी स्थितियों, तत्सम्बन्धी बयानबाजियों से न केवल भारतीय सैनिक चिंतित हैं, बल्कि शांतिप्रिय लोग भी यह सबकुछ सोच-समझकर परेशान हो जाते हैं।

स्थिति इतनी विकट हो चुकी है कि उपर्युक्त दोनों हालातों पर आत्मरक्षार्थ गोलियां चलाने के अलावा भारतीय सुरक्षा बलों के अब कोई दूसरा चारा नहीं बचा है। अन्य सारे सख्त विकल्प या तो फेल हो चुके हैं, या फिर अविवेकी नागरिक प्रशासन द्वारा विफल कर दिए गए हैं, कभी मानवाधिकार तो कभी जनतंत्र की आड़ लेकर, जो कि चिंताजनक बात है सैनिकों के लिये। उससे भी बढ़कर अमनपसंद लोगों के लिये। कहना न होगा कि एक देश में ‘दो विधान-दो निशान’ को मिली मान्यता इसकी सबसे बड़ी बजह समझी जा रही है, जिससे समय रहते ही निजात पाने की दरकार है।

शोपियां गोलीकांड के मद्देनजर सामने आए राजनैतिक आरोप-प्रत्यारोप से एक बात स्पष्ट है कि बिना राजनैतिक शह के जम्मू-कश्मीर पुलिस ऐसी बड़ी गलती कभी नहीं करती! वो भी उस भारतीय सेना के खिलाफ जिसकी सरपरस्ती में वह सूबेवासियों समेत सुकून की जिंदगी जी रही है। फिर भी जिस तरह से  नेशनल कांफ्रेंस ने सैनिकों की गिरफ्तारी की मांग की, और  बीजेपी ने प्राथमिकी को ही वापस लेने की मांग कर डाली, उससे इतर यदि मुख्यमंत्री महबूबा इस मामले की जांच कराने की नीयत रख रही हैं, तो उसके अपने फायदे और घाटे हो सकते हैं। इसलिये यह कहना गलत नहीं होगा कि पीडीपी नेत्री और मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती या उनके दल के लोग इतनी घिनौनी राजनीति न करें, वह भी तब जबकि उनकी सरकार की बैशाखी ही बीजेपी जैसी राष्ट्रवादी पार्टी बनी हो!

आखिरकार पीडीपी मुखिया व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती यह बात कब समझेंगी कि उनकी सहयोगी पार्टी बीजेपी को जम्मू-कश्मीर में गठबंधन की सरकार भी चलानी है, और उससे भी बढ़कर केंद्र में सत्तारूढ़ होने के नाते व पूरे देश में हो रहे पार्टी के अभूतपूर्व विस्तार के मद्देनजर अपनी राजनैतिक साख भी बचानी है। हाँ, यदि महबूबा इस कड़वी जमीनी सच्चाई से अनभिज्ञ बने रहना चाहती हैं और गठबंधन धर्म निभाने से इतर वक्त-वक्त पर अपने राजनैतिक मित्र को उसकी औकात बताते रहने की सुनियोजित फितरत रखती हैं, तब तो कोई बात नहीं।

फिर भी, महबूबा को यह समझना होगा कि कभी पत्थरबाजों को रिहा करने, या फिर सैनिकों पर प्राथमिकी दर्ज करवाने आदि सियासी कूचक्रों के अपने लोकतांत्रिक फायदे हो सकते हैं। लेकिन उन्हें यह कतई नहीं भूलना चाहिए कि उनकी इन ओछी राजनैतिक हरकतों से जिन प्रशासनिक मूल्यों का घाटा हो रहा है, उसकी भरपाई करना किसी भी लोकतांत्रिक सरकार के लिये भविष्य में तो मुश्किल होगा ही, और यही एक दिन उनकी राजनैतिक पतन का भी सबब बनेगा।

लिहाजा, क्या करना है? कैसे करना है? यह सोचने-समझने के लिये सरकार में शामिल दोनों गठबंधन साथी स्वतंत्र हैं, यदि हाथी जैसे खाने के दांत कुछ और, दिखाने के दांत कुछ और ही हैं तो। लेकिन उन्हें सोचना चाहिये कि जनता सब कुछ समझती है और माकूल वक्त आने पर ऐसी चुनावी सबक सिखाती है कि हाथ मलने के अलावा कुछ शेष नहीं रह जाता। वो मानें या न मानें, उनकी मुख्य प्रतिस्पर्द्धी पार्टी नेशनल कांफ्रेंस और उसके नेता द्वय फारुख अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला का नजीर उनके सामने है।

अब जरा कल्पना कीजिये कि यदि सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (अफ्स्पा) वहां लागू नहीं होता तो फिर क्या होता? अब यह भी समझना मुश्किल नहीं है कि जम्मू-कश्मीर-पूर्वोत्तर के कतिपय लोग क्यों इसका विरोध करते हैं और इसे हटाने की मांग करते हैं? स्पष्ट करते चलें कि यह कानून गड़बड़ी वाले क्षेत्रों में विभिन्न अभियान चलाते समय सुरक्षा बलों को विशेष अधिकार और छूट प्रदान करते हैं।

यह बात दीगर है कि भारतीय सेना की नीयत कभी भी इस कानून का दुरुपयोग करने की नहीं रही है। सेना प्रमुख बिपिन रावत ने भी इसे स्पष्ट कर दिया है। इसलिये शोपियां, पुलवामा और अनंतनाग में जारी अलगाववादियों की हड़ताल में हो रहे उपद्रव और ठप्प इंटरनेट सेवाओं से स्थानीय लोग ही परेशान होंगे, उन्हें यह समझते हुए उपद्रव बन्द कर देना चाहिए। इससे न तो भारतीय सुरक्षा बलों का कुछ बिगड़ेगा, न ही अलगाववादियों-आतंकियों का कुछ भला होगा।

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