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मंथरा सिंड्रोम से ग्रसित हैं एससीएसटी एक्ट विरोधी, नोटा समर्थक राष्ट्रवादी

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आलेख: मुरारी शरण शुक्ल। भारत के चक्रवर्ती सम्राट का उत्तराधिकारी तय किया जा रहा था। अयोध्या में आगामी भारत सरकार बनाने की तैयारियाँ जोरों पर थी। भारत का भाग्य निर्धारित होने वाला था। भावी भारत की पुनर्रचना की तैयारी चल रही थी। जगत्प्रसिद्ध कालजयी रामराज्य की नींव खड़ी की जा रही थी भविष्यद्रष्टा वशिष्ट के द्वारा। जनता के परम हितैषी राष्ट्रउन्नायक श्री राम के राज्याभिषेक की तैयारियाँ जोरों पर थी। तभी मंथरा ने त्रिया चरित्र दिखाया और कैकेयी को ताना मारते हुए स्त्रियोचित संवाद सुनाया। को नृप होंहु हमें का हानि। चेरी छोड़ न होईब रानी।। देवी सरस्वती ने कैकेयी की मति घुमाया और देवासुर संग्राम की चैंपियन योद्धा रही कैकेयी जिसे राम अपने पुत्र से भी अधिक प्रिय थे उसने उस राम को वनवास भेजने का प्रबंध कर दिया। कालचक्र बलवान होता है। करम गति टारे नाहिं टरि। भारत के भाग्य में जो अंकित है उस होनी को कौन टाल सकता है? किन्तु तब भारत में कोई अनहोनी नहीं हुई, कोई अनिष्ट नहीं हुआ क्योंकि राज्य चक्रवर्ती सम्राट का था। जगत में विरोधी कोई भी नहीं था अवधपुरी के राज्य का। और भरत जैसा सेवापरायण, प्रजापालक, साधक राज्यसंचालक मिल गया था अयोध्या को। जिसने राम के खड़ाऊँ को राजगद्दी पर बिठाकर कुशल राज्य संचालन किया। अयोध्या का तब कोई अहित नहीं हुआ। उल्टा आदर्श स्थापित हुआ।

किन्तु आज की परिस्थिति उतनी सुगम नहीं है। आज भारत शत्रु विहीन नहीं है। आज योग्यतम व्यक्ति को हटा दिया तो राष्ट्र के पास कोई उत्तम रिप्लेसमेंट नहीं है। यदि योग्यतम को हटाया तो राष्ट्र के शत्रुओं का ही राज्याभिषेक होना निश्चित है। आज भारत के ग्यारह राज्यों के 220 जिले माओवाद से प्रभावित है। 200 से अधिक मिनी पाकिस्तान बन चुके हैं भारत में। लगभग 50 जिलों में मिशनरीज का आतंक है। मल्टीनेशनल कम्पनियाँ मनी गेम खेलने की ताक में बैठी हैं। एनजीओ ब्रिगेड देश को अस्थिर करने में लगा हुआ है। देशद्रोहि सेक्युलरी बीमारी कैंसर की तरह राष्ट्र को ग्रसित करता जा रहा है। कई राज्य तो भारत से अलग होने की स्थिति में हैं। सेना के बलपर हमने कश्मीर को सम्हाल रखा है। पश्चिम बंगाल की स्थिति विस्फोटक होती जा रही है। आसाम घुसपैठियों के कारण रक्तरंजित हुआ जा रहा है। केरल मदरसाई जिहाद, मिशनरीज और मार्क्सवादियों के चपेट में आकर कराह रहा है। मतान्तरण तेज गति से हो रहा है। आतंकवाद, अलगाववाद पूरे देश में अपना पांव पसार रहा है। रीती, नीति, प्रकृति, पर्व, परम्परा, इतिहास, शिक्षा, संस्कार, पूर्वज, धर्मस्थल, धर्मग्रंथ, मंदिर, नदियाँ, जलस्रोत, वन संपदा, जैव संपदा, प्राकृतिक संसाधन, अर्थव्यस्था, सामाजिक ढाँचा, जातिगत सामाजिक व्यवस्था, परिवार संस्था सब पर निरंतर आक्रमण व अतिक्रमण हो रहा है।

ऐसे में राष्ट्रभक्ति का नाम लेकर मंथरा बन जाना कोई बुद्धिमता का लक्षण नहीं हैं। मंथरा सिंड्रोम वैसे स्त्रैण लक्षण है जिससे आज के युवक ग्रसित हो रहे हैं। स्त्रैण ही बनना था तो पद्मिनी की भाँती धधकती ज्वाला में सखियों संग कूद कर राष्ट्र की अस्मिता की रक्षा का विचार उत्तम होता। किन्तु अपने पांव पर बार बार कुल्हाड़ी मारने की पुरानी आदत आज भी हिन्दू समाज की गई नहीं। हम पानीपत की लड़ाई में मराठों का साथ न दे सके। और शत्रुओं को विजयी होते देखते रहे तमाशाई बनकर। हमने वही काम बाद में भी किया। हमने भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, सुभाष चंद्र बोस के स्थान पर अंग्रेजों की सेफ्टी वाल्व गाँधी की काँग्रेस का साथ दिया। आजादी के बाद भी सावरकर और करपात्री जी को भाव न देकर पंजे से पंजा मिलाया। अटल बिहारी बाजपेयी को भी बहुमत न दिया भले ही आज लोग उनकी मृत्यु के बाद प्रोफ़ाइल डीपी लगाए फिर रहे हैं। तब भी कोई समाज बैकवर्ड राजनीति करके विश्वनाथ प्रताप सिंह को वोट दे रहा था। तो फारवर्ड नेहरू खानदान को ब्राह्मण कहकर काँग्रेस को वोट कर रहे थे। जातिवाद चरम पर था। जातिवादी नेताओं की बाढ़ आई हुई थी और हम ही उन सब के हथकंडे थे।

परिणाम वोट टुकड़ों टुकड़ों में बिखरता रहा। जनादेश खंडित होता रहा। जनता देश के लिए सोच पाने की क्षमता खो चुकी थी। कुकुरमुते की तरह दल पर दल बनते गए। एक एक जाति के एक एक दल बनते रहे। एक एक राज्य में अनेकानेक क्षेत्रीय दल बनते रहे। दलों के दलदल में देश डूबता रहा। जनता की अदूरदर्शी मूर्खता के कारण देश को लूटा गया जमकर। अर्थव्यवस्था डूबती चली गई। देश का सोना भी गिरवी रखना पड़ा। जनजीवन अस्त व्यस्त होता चला गया। महंगाई, भ्र्ष्टाचार और न जाने क्या क्या देश को झेलना पड़ा। बड़ी कठिनाई से अटल जी की सरकार बनी। उन्होंने अल्पमत की सरकार चलाया। बैशाखियों पर सरकार नहीं चली प्रत्युत बैशाखियों पर देश झूलता रहा। परमाणु परीक्षण और कारगिल युद्ध की ऐतिहासिक विजय समेत अनेकानेक साहसिक कदम उठाकर अटल जी ने देश को नई ऊँचाई पर पहुँचाया। विश्व के बड़े देशों के प्रतिबंध के बाद भी भारत की अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाई दिया। किंतु काँग्रेस के द्वारा तब पीछे के 45-50 वर्ष के दिये हुए पिछड़ेपन को हमने अटल बिहारी बाजपेयी के माथे पर थोपकर उनको गाली देना आरम्भ किया। और परिणाम दस वर्षों तक हमने सोनियाँ- मनमोहन सरकार को खुला मैदान दे दिया।

उस दस साल में कोई विरोध नहीं कर पाया कांग्रेस का। जिसने भी विरोध करने का प्रयास किया उसकी बोलती बंद कर दी गयी। भाजपा के विरोध रैली में भी प्रायः लाठीचार्ज, आँसू गैस और पानी का फब्बारा आम बात थी काँग्रेसी राज में। विपक्ष को सहन न कर पाने वाली और देश पर इमरजेंसी थोपने वाली काँग्रेस आज विपक्षी दल की हैसियत न होने पर भी पूरे देश में देश का विपक्ष बनती फिर रही है। और देश में असहिष्णुता और डिक्टेटरशिप होने का झूठ फैलाती नजर आ रही है। जब देश की जनता ने साथ न दिया तो सरकार बनाने के लिए पाकिस्तान का साथ माँगती नजर आ रही है। जेएनयु के टुकड़े गैंग के साथ खड़ी काँग्रेस, कश्मीर के पत्थरबाजों पर पैलेट गन का प्रयोग रुकवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट जाने वाली काँग्रेस, बम विस्फोट करके और गोलियाँ बरसाकर देश को घायल करने वाले आतंकवादियों से सहानुभूति रखने वाली काँग्रेस, जंगल के माओवादियों की तरफदार काँग्रेस, शहरी माओवादियो की गिरफ्तारी को असंवैधानिक कहती काँग्रेस, डोकलाम के समय चाईना का साथ देती काँग्रेस से आप क्या उम्मीद करते हैं कि वो आपके लिए एससीएसटी एक्ट हटवा देगी? यदि यह एक्ट हटाना ही होता तो 1989 में यह एक्ट लागू क्यों करती काँग्रेस? इस एक्ट के नाम पर झूठ फैलाने वाले लोग काँग्रेस के ही प्यादे हैं।

दैव दैव आलसी पुकारे। को नृप होंहु हमें का हानि? होइहें सोई जो राम रची राखा। उपरोक्त तीन पंक्तियाँ दुहरा दुहरा कर हिन्दू समाज चिन्तनविहीन, दायित्वविहीन, पुरुषार्थविहीन, राष्ट्रभक्तिविहीन, धर्मविरुद्ध, नास्तिक, अविचारी, कुविचारी, राष्ट्रघाती और आत्मघाती हो गया है। वसुधैव कुटुम्बकम का वैश्विक चिन्तन करने वाले पुरखों की संताने आज जाती, भाषा, क्षेत्र की संकुचित सोच से ग्रस्त हो गई हैं। छोटे छोटे दायरे में सोचते हुए राष्ट्रहित को समझना आज लगभग असंभव हो गया है। आज निजी स्वार्थ हावी होता जा रहा है। सोसल सेंस खतम होता जा रहा है। घर का कूड़ा सड़क पर फेंककर निश्चिन्त हो जाने वाले लोगों से देशहित की अपेक्षा करना उचित भी नहीं। सपने में भी किये गए दान को जागृती में निभा देने वाले सत्यनिष्ठ देश में झूठ और फरेब का बोलबाला बढ़ता जा रहा है। यह सारी विसंगति प्रायोजित है। किन्तु तब भी देशविरोधी राजनीति से संचालित लोग आपको राजनीति और देश का पाठ पढ़ाते नजर आते हैं।

मोदी एक व्यक्ति हैं। भगवान नहीं। उनसे गलतियाँ हो सकती हैं। किंतु देश के लिए मोदी से बढ़िया और अनुभवी शासक अभी दूर दूर तक कोई नजर नहीं आता। मोदी योग्य नहीं होते तो सभी देशविरोधी तत्व मोदी का विरोध न कर रहे होते। भारत विरोधी सभी लोगों और देशों के द्वारा मोदी विरोध न हो रहा होता। माओवादी मोदी की हत्या का षड्यंत्र न कर रहे होते। इस्लामिक आतंकवादी मोदी की हत्या का षड्यंत्र न कर रहे होते। एससीएसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा संघ या मोदी ने नहीं डाला था। किन्तु सुप्रीम कोर्ट का फैसला आते ही उस फैसले को मोदी सरकार का निर्णय बताकर देशव्यापी दलित आदिवासी आंदोलन खड़ा को सक्रिय हो गए लोग आखिर कौन थे? इसी बहाने देश को अस्थिर करने का षड्यंत्र करने वाले लोग कौन थे? बहुत परिश्रम पूर्वक आदिवासी और हरिजन समुदाय में मजबूत जनाधार ख़ड़ा किया मोदी ने। इस बढ़ते जनाधार से भयभीत होकर राजीव गाँधी टाइप कांड की बात करने वाले लोग कौन थे? देश के गरीबो के लिए काम करके उनके हृदय में पहली बार उम्मीद की किरण जगाने वाला व्यक्ति अदालती खेल के बहाने अपना खेल खराब न होने दे इसके लिए आवश्यक था यह संशोधन। कोर्ट द्वारा बदले हुए विषयों को यथावत कर देना युक्तिसंगत ही था।

यदि आदिवासी और हरिजन जातियों का वोट भाजपा के साथ जुड़ा रहता है तो निश्चित ही इससे मार्क्सवाद, माओवाद और मिशनरीज का भविष्य में खेल खतम हो जायेगा। उनको जिस समुदाय में स्थान मिलता था वह लिफ्ट मिलना बंद हो जाएगा। मीम भीम का समीकरण ध्वस्त हो जाएगा। योगेंद्र मंडल के पश्चाताप से देश परिचित हो जाएगा। देश को गरीब बनाये रखने के माओवादी, मार्क्सवादी, मिशनरीज षड्यंत्र का अंत हो जाएगा। अनुसूचित जाति और जनजातियों का भाजपा से जुड़ाव राष्ट्रभक्ति के भाव को नई ऊंचाई देगा। गरीबों, वंचितों, शोषितों, पीड़ितों की पीड़ा समाप्त होने का मार्ग प्रशस्त हो जाएगा। आज नार्थ ईस्ट में यह प्रभाव दिख रहा है। आदिवासी बहुल राज्यों गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तरप्रदेश, बिहार और आसाम में यह दृष्टिगोचर हो रहा है। मिशनरीज के खिलाफ चल रहे जांच इत्यादि से बौखलाए लोग जिनकी राजनीति में मिशनरीज वाले सहायक हुआ करते होंगे आज एससीएसटी एक्ट के सहारे काँग्रेसी पाप मोदी के सिर मढ़ने का प्रयास कर रहे हैं। माओवादियों की गिरफ्तारी से जिनकी राजनीति हिल रही है वो भी इस तिकड़म में प्रयत्नशील दिखाई पड़ रहे हैं।

माना आपको संघ से कुछ मतभेद होगा तब भी संघ के विरोध का निहितार्थ एससीएसटी एक्ट के बहाने समझ से परे है। जो लोग संघ का विरोध इस मुद्दे पर कर रहे हैं वो निश्चित ही संघ विरोधी हैं। उनके भारतद्रोही होने की संभावना भी कम नहीं है। इनकी जमात में कुछ नासमझ देशभक्तों के सम्मिलित हो जाने से स्थिति गंभीर हो जाता है। एससीएसटी एक्ट 1989 में लागू किया था राजीव गाँधी सरकार ने। तब से ही यह एक्ट नॉन बेलेबल था। लेकिन आज झूठ फैलाया जा रहा है कि मोदी ने इस एक्ट को नॉन बेलेबल ऑफेंस बना दिया। झूठ के सहारे संघ और मोदी को बदनाम करने का षड्यंत्र सोची समझी रणनीति का हिस्सा है। ऐसी फरेबी रणनीति केवल काँग्रेसी, मार्क्सवादी और मिशनरीज ही बना सकते हैं। बाकी लोग बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना की भाँति मूर्खता में कोट पैंट पहनकर नाच रहे हैं। हमारा विवेक कब जागृत होगा? हम कब हंस से नीरक्षीर विवेक सीखेंगे या जीवन भर बगुला ही बने रहेंगे?

जैसे व्यक्ति की एक निश्चित आयु होती है वैसे ही संगठन की भी एक निश्चित आयु होती है। यदि व्यक्ति बूढ़ा और बीमार हो जाता है तो बच्चे परिवार का मुखिया बनकर परिवार सम्हाल लेते हैं। वैसे यदि संगठन भी अशक्त और बीमार हो गया है तो समय शिकायत करने और सैड सांग गाने का नहीं है। बल्कि समय आगे बढ़कर झंडा थाम लेने का है। आज का नौजवान मूर्खता करता दिखाई दे रहा है। जहाँ उसको देश के नेतृत्व के लिए कमान सम्हाल लेने का स्वर्णिम अवसर था वहीं वह भारत को बंद कराने की मार्क्सवादी तकनीक अपनाता दिख रहा। इस भारत बंद से किसका लाभ होने वाला है? इस बंद से देश को कितना लाभ होने वाला है? यह विनाशकारी लक्षण है। जहाँ देश को आगे बढ़ाने के लिए युवाओं के बलिदान की आवश्यकता थी वहीं हमारे युवा देश को बर्बाद करने की मूर्खता में लग गए हैं। यह पीड़ादायी है।

देश बंद कराना, राज्य बंद कराना, दुकान और बाजार बंद कराना, बसें रोक देना, रेल रोक देना यह सब मार्क्सवादी हथियार है। इसका आश्रय लेने वाले लोग निश्चित ही मार्क्सवादियों के स्लीपर सेल के इशारे पर अनाजने में देश के विरुद्ध उछल रहे हैं। ये मार्क्सवादी अपने नैरेटिव्स के सहारे आपके दिमाग को दिग्भ्रमित करने का हुनर जानते हैं। वो आपके पक्ष की चार बातें करके अपने पक्ष की चार बातें तरीके से उसमें घुसेड़ देना जानते हैं जिससे उनका संदेश समझे बिना आप उनको अपना लें। और आज यही होता दिखाई दे रहा है। आज देश को अस्थिर करने की मार्क्सवादी तिकड़म देश को अस्थिर करती नजर आ रही है। लोगों के मन की गहराई में बैठी जातिवादी सोच को उभार देने में उनलोगों ने सफलता पाया है और लोग हिप्नोटाइज होकर उनके द्वारा परोसे हुए झूठ बोलते नजर आ रहे हैं। सब षड्यंत्रों को आप समझ जाएँगे और अपने ही समाज के हरिजन, आदिवासी भाईयों को गले लगाने का मानस बनायेंगे यह उम्मीद देश के देशभक्त युवाओं से आज की जा सकती है। मंथरा की चाल में आने से देश की प्रगति की गति मंथर हो जाएगी जो अत्यंत हानिकर होगा।

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