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आखिर कैसी है ये व्यवस्था।

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वेतन विसंगति के जाल में फँसे है शिक्षक, शिक्षकों के जाल में फँसी है शैक्षणिक कार्य और इस दौर में सबको पछाड़ने की होड़ में जुटी है सरकार की लोकलुभावन नीति, आखिर कैसी है ये व्यवस्था ,जिसमें हो रही सरकारी विद्यालय में पढ़ने वाले मासूम बच्चों के भविष्य की निर्मम हत्या ???

रविवार का दिन है समय करीब साढ़े तीन बजे थे कि नीतीश कुमार हाय-हाय,वेतन चोर गद्दी छोड़ की नारों ने अपनी रौद्र गूँज से अनायास राह चल रहे राहगीरों को अपनी ओर खींचने लगा । वीआरसी कार्यालय पर हो रही चोर -चोर की शोर से लोग असहजता के साथ दौड़े ।वहाँ खड़ी शिक्षकों की एक झुंड माननीय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का पुतला लिये दहन करने की तैयारी कर रहे था ।

मसला समझ से परे तो नहीं थी, लेकिन भविष्य की चिंता जरूर दे रहा था । ये चिंता अपने भविष्य से भारती के विदाई की थी । मस्तिष्क में विचरण करने वाली भविष्य सृजन की सृजनात्मकता मौत के मुहाने पर खड़ी देख कर भावहीन शब्द अश्रु नेत्रों के जलाशय होकर निकल पड़ता है कि “आखिर कैसी है ये व्यवस्था ” ।

सवाल ये नहीं है कि शिक्षक क्यों कर रहें है आन्दोलन, बल्कि सवाल है कि सरकार क्यों नहीं करती शिक्षकों की समस्या का स्थाई समाधान ? क्यों नहीं सरकार शिक्षकों को स्पष्ट संदेश देकर बिगड़े शिक्षा व्यवस्था में सुधार लाकर सरकारी विद्यालय के भरोसे भविष्य निर्माण के अभिलाषा लिये बच्चे के साथ न्याय कर पा रही है?

आखिर क्या चाहती है सरकार और क्यों नहीं करती है उसके लिए प्रयास? क्यों नहीं सरकार शिक्षक को भरोसे में ले पाती है, ताकि बार-बार हो रही आंदोलन की प्रक्रिया पर विराम लगे और पटरी से उतरी शैक्षणिक महौल पुनः विरासत में मिलने वाली सम्मान के करीब पहुंच सके?

सरकार और शिक्षक, वेतन विसंगति और वेतन सुसंगती के मकड़जाल जाल के बीच सरकार की लोकलुभावन नीति भी बंदर -कौवे की खेल को अमलीजामा पहनाकर छात्र और अभिभावक पर क्रूरता बरपा रही है । सीआरसी, वीआरसी और मुफ्त शिक्षा के अधिकार में सम्पूर्ण शिक्षा ही समाप्त हो रही है
। पोशाक के चक्कर में किताब भूल रहे है. खिचड़ी के फिराक में शिक्षा संस्कार समाप्त हो गया और छात्रवृत्ति पाने की फौलादी जंग में चरित्र निर्माण का अश्व अस्त्र से अनुशासन का कोमल तन जीर्ण-शीर्ण हो गया । सरकार आखिर कौन सी शिक्षा और किस तरह के मौलिक अधिकार को संरक्षित -संवर्धित करना चाह रही है?

आखिर कब तक चलता रहेगा किताब विहीन विद्यार्थी, भवन विहीन विद्यालय और वेतन विहीन शिक्षक का खेल? कब तक भवन विहीन विद्यालय में छात्रों को छात्रवृत्ति, पोषाक राशि, खिचड़ी और साईकिल वाली वोट की चॉकलेट दी जाती रहेगी ।क्या सरकार हमारी मेघा को कुंठित करने का षड्यंत्र तो नहीं कर रही है ?

सरकार को शिक्षा व्यवस्था की सरलता को कायम कर शिक्षकों को गैर शैक्षणिक कार्यों से विलग करने की आवश्यकता है, उसके वेतन विसंगति को दूर करना चाहिए, ताकि सरकार -शिक्षक द्वंद्व युद्ध में बच्चे के भविष्य की निर्मम हत्या बंद होकर समृद्ध बिहार -समृद्ध राष्ट्र की परिकल्पना साकार हो सके ।

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