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आखिर कैसी होगी भारत-प्रशांत क्षेत्र की वैकल्पिक राह?

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कमलेश पांडे, वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार। हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा और आधारभूत ढांचे को बढ़ाने की सामूहिक फिक्र के चलते अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान और भारत ने परस्पर मिलकर जिस ‘संयुक्त क्षेत्रीय बुनियादी ढांचा परियोजना’ की परिकल्पना को अपनी अपनी सहमति प्रदान की है, वह चीन की ‘वन बेल्ट वन रोड परियोजना’ का रणनीतिक रूप से करारा जवाब है। इस प्रस्तावित परियोजना की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इस पर किसी एक देश का आधिपत्य नहीं होगा, बल्कि चारों देशों के परस्पर सहयोग से ही उनके आर्थिक और सामरिक हित सधेंगे।

भारत के लिये इस परियोजना का क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय दोनों नजरिये से विशेष महत्व है, क्योंकि इस परियोजना से चीन को चुनौती देने वाला न केवल एक नया विकल्प उभर कर सामने आया है, बल्कि उसे अपने कारोबारी विस्तार के लिये एक नया  वैकल्पिक रास्ता भी मिलेगा, जिस पर उसके धूर विरोधी देश चीन की दादागिरी तो कतई नहीं चलेगी। इसलिये यह प्रस्तावित  परियोजना भारतीय नेतृत्व के द्वारा अर्जित एक और बहुत बड़ी रणनीतिक सफलता है, जिससे देश-दुनिया में उसका निःसंदेह महत्व बढ़ेगा।

कहना न होगा कि नए दौर की दुनिया को एक ऐसे इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत है जो सभी देशों को आपस में जोड़े, जिससे उनका कारोबारी विस्तार हो। यही वजह है कि चीन ने न केवल अपनी ‘वन बेल्ट वन रोड परियोजना’ प्रस्तुत की, बल्कि इसे लेकर पूरी दुनिया के बहुतेरे देशों को अलग-अलग सब्जबाग भी दिखाए हैं। दरअसल यह परियोजना चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की पसंदीदा योजना है जिसके तहत चीन के पड़ोसी देशों के अलावा यूरोप को सड़क मार्ग से जोड़ेगा।

ऐसा होने से चीन दुनिया के कई बंदरगाहों से सीधे जुड़ जाएगा।  रूस, ईरान, इराक के अलावा इंडोनेशिया, बंगाल की खाड़ी, श्रीलंका, भारत, पाक, ओमान के रास्ते इराक तक उसका पहुंचना भी आसान हो जाएगा। इसके अलावा, चीन-पाकिस्तान इकॉनोमिक कॉरिडोर (सीपेक) के तहत पाक के ग्वादर पोर्ट को चीन के शिनजियांग से जोड़ा जा रहा है। इस परियोजना का आर्थिक पक्ष/तर्क बेहद मजबूत है। इसकी खास विशेषता यह है कि रोड, रेलवे समेत कई आधारभूत ढांचे विकसित किये जायेंगे। यही वजह है कि भारत समेत कुछ देश इसे चीन की बढ़ती वैश्विक महत्वाकांक्षा का प्रतिफल समझ रहे हैं और अपनी ओर से अपेक्षित सावधानी भी बरत रहे हैं।

इस बात में कोई दो राय नहीं कि एशिया, यूरोप और अफ्रीका में भी ऐसे बहुत से देश हैं, जिन्हें ऐसी किसी परियोजना की जरूरत है, लेकिन सिर्फ इसके लिये वे चीन जैसे महत्वाकांक्षी और विस्तारवादी देश पर कतई भरोसा नहीं कर सकते। क्योंकि पिछले काफी समय से वे देश चीन की दादागिरी के शिकार रहे हैं। ऐसे देशों का मानना है कि चीन अपनी ‘वन बेल्ट वन रोड परियोजना’ के नाम पर दुनिया में राजनैतिक आधिपत्य चाहता है, क्योंकि यह परियोजना उसे वह ढांचा दे देगी जिससे वह जरूरत पड़ने पर कहीं भी हस्तक्षेप कर सके। यही वजह है कि जनसंख्या के मामले में चीन के बाद दूसरे सबसे बड़े देश भारत ने इस परियोजना का लगातार विरोध किया है, जिसे अब चीन विरोधी देशों का समर्थन हासिल हो चुका है। भारत समेत चार मजबूत देशों की ‘संयुक्त क्षेत्रीय बुनियादी ढांचा परियोजना’ इसी का प्रतिफल है।

दरअसल, चीन की ‘बेल्ट एंड रोड इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना’ से जिसे कई बार ‘वन बेल्ट वन रोड परियोजना’ भी कहा जाता है, का पहला हिस्सा माना जाने वाला ‘चाइना-पाकिस्तान कॉरिडोर’ से भी उसकी बदनीयती को आसानी से समझा जा सकता है। क्योंकि चीन से पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह तक जाने वाली यह सड़क कश्मीर के उस हिस्से से निकलती है जो पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) में है। हैरत की बात है कि ऐसा करने से पहले चीन ने न तो भारत की भावनाओं का ख्याल रखा और न ही कश्मीर पर उसके दावों का कोई ख्याल रखा। यही वजह है कि भारत इसका विरोध कर रहा है।

याद दिला दें कि चीन ने भारत के साथ ऐसा पहली बार नहीं किया। इससे पहले भी वह उसी क्षेत्र में काराकोरम मार्ग बना चुका है। हाल-फिलहाल में उसने भूटान के नाथुला तक सड़क बनाने की कोशिश की, जिसका भारत ने कड़ा प्रतिवाद किया। जाहिर है कि चीन उन तमाम जगहों पर अपनी पहुंच बना रहा है, जो भारत के लिये सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। लिहाजा, अब यह बात किसी से छिपी हुई नहीं है कि भारत को चारों ओर से घेरने के लिये चीन ने पाकिस्तान के अलावा नेपाल, म्यांमार, श्रीलंका और मालदीव आदि देशों में भी आधारभूत ढांचे के नाम पर अपने केंद्र बना रहा है।

इसके अलावा, दक्षिण चीन सागर में भी चीन अपना एकाधिकार जतलाता है, जिसके चलते जापान समेत चार देशों से उसका विवाद चल रहा है। यही वजह है कि भारत भी चीन को घेरने के लिये चीन विरोधी धुरी में शामिल हो चुका है। हाल में ही एक प्रतिष्ठित ऑस्ट्रेलियाई अखबार ने भी इस बात का खुलासा किया है कि भारत ने बीजिंग के बढ़ते प्रभाव को कम करने के लिये अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान के साथ मिलकर एक ‘संयुक्त क्षेत्रीय बुनियादी ढांचा परियोजना’ बनाई है जो भले ही प्राथमिक चरण में है, लेकिन इन देशों के आपसी कूटनीतिक समझौतों में शामिल हो चुका है।

बहरहाल, जापान के कैबिनेट सचिव योशीहीदा सुगे भी बता चुके हैं कि हाल ही में मनीला में हुई आसियान बैठक में भी इस पर अलग से चर्चा की गई थी, जिससे इसके महत्व का पता चलता है। इसी सप्ताह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्फ और आस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री मैल्कम टर्नबुल के बीच भी अमेरिका में इस अहम मसले पर भी चर्चा होगी। लिहाजा यह अब तय हो चुका है कि देर-सबेर ही सही, लेकिन उक्त महत्वाकांक्षी परियोजना से जुड़ा सामूहिक स्वप्न भी अब शीघ्र साकार हो  जायेगा। क्योंकि चारों देशों के नेतृत्व ने इसमें गहरी दिलचस्पी दिखाई है।

दरअसल, आर्थिक और सामरिक मामलों में भारत और चीन की आपसी प्रतिद्वंद्विता अब दिन-प्रतिदिन बढ़ेगी ही, यह बात  जगजाहिर है। पास-पड़ोस की चिंताजनक स्थिति भी इसी बात की चुगली कर रही हैं कि निकट भविष्य में ये हालात और जटिल होंगे। परस्पर मनमुटाव बढ़ेगा, सो अलग। यही वजह है कि भारत समेत चार देशों की मिलीजुली भागीदारी वाली प्रस्तावित ‘संयुक्त क्षेत्रीय बुनियादी ढांचा परियोजना’ का खाका क्या होगा? इस पर कैसे अमल सुनिश्चित किया जाएगा? क्या इससे किसी दूसरे शीत युद्ध की शुरुआत होगी? यह जानने की दिलचस्पी सिर्फ चीन ही नहीं, बल्कि सारेजहाँ की बढ़ी है और बढ़नी भी चाहिए।

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