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हिन्दू आतंकवाद: तब, अब और हमसब

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आलेख: कमलेश पांडे। लीजिये कथित हिन्दू आतंकवाद का एक और गुब्बारा फुट गया।  क्योंकि हैदराबाद के मक्का मस्जिद बम धमाकों के मामले में स्वामी असीमानन्द समेत सभी पांच आरोपी बरी कर दिए गए। ऐसा पहली बार नहीं हुआ। इससे पहले भी सन्दिग्ध भगवा आतंकवाद से जुड़े विभिन्न मामले अदालतों में टिक नहीं पाए। क्यों नहीं टिक पाए, समझना मुश्किल नहीं! इसलिए अब इसके पीछे की घिनौनी राजनीति पर ही नहीं, बल्कि नौकरशाही और न्यायपालिका की निष्पक्ष भूमिका पर भी सवाल उठना लाजिमी है, और इसे उठाने में ही हमारी-आपकी भलाई है क्योंकि लोकतंत्र को मजबूत बनाना है और शासन-प्रशासन को बेदाग।

सवाल है कि कांग्रेस सरकार में गढ़े गए हिन्दू आतंकवाद या भगवा आतंकवाद के जुमले हकीकत थे या फिर उससे कोसों दूर। क्योंकि तब भाजपा और संघ ने इसका कड़ा प्रतिवाद किया था, फिर भी कांग्रेस के घाघ नेता इसकी चर्चा करके बिहंसते फिरते थे। कोढ़ में खाज यह कि उस समय की हमारी नौकरशाही ने भी कांग्रेस के परोक्ष चाभूक की डर के आधार पर फैसले लिए थे और बहुतेरे सम्भ्रांत साधु-संत प्रवृति के लोगों को भी विभिन्न हिंसक कांडों में संलिप्त ‘आतंकवादी’ इस  षड्यंत्रकर्ता ठहराकर गिरफ्तार किया, जुल्म ढाए और विभिन्न न्यायालयों में पेश कर जेलों में डलवा दिया। शायद तब के प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह और कांग्रेस सुप्रीमो सोनिया गांधी तथा उनके भरोसेमंद सिपहसालारों को यह रत्ती भर भी  एहसास नहीं रहा होगा कि उनकी यही करतूत कांग्रेसी सत्ता प्रतिष्ठान की ताबूतों की अंतिम कील साबित होगी। जाहिर है हमारे संविधान निर्माताओं ने नौकरशाही और न्यायपालिका से जिस स्वविवेकी निर्णय की अपेक्षा की थी, वह तब 24 अकबर रोड स्थित कांग्रेस मुख्यालय में गिरवी रखी हुई महसूस की गई।

लेकिन कालचक्र की गति बड़ी क्रूर लेकिन न्यायी होती है। वाकई धर्मनिरपेक्षता की आड़ में अल्पसंख्यक साम्प्रदायिकता की तुष्टिकरण करके अपनी सत्ता को चिरस्थायी बनाने के जो सपने कांग्रेस रणनीतिकारों ने देखे थे, वो आरएसएस के त्याग और बलिदान तथा बीजेपी रणनीतिकारों के सामाजिक चक्रब्यूह के सामने टिक नहीं पाए और तार तार हो गए। कहना न होगा कि गुजरात दंगों 2002 की आड़ लेकर जिस नरेंद्र मोदी (तब मुख्यमंत्री गुजरात, अब प्रधानमंत्री) को खूब सताया गया, वही व्यक्ति अपने फौलादी इरादों और दृढ़ विश्वास के बल पर 2014 में भारी बहुमत से डॉ मनमोहन सिंह को मात देकर देश का प्रधानमंत्री बने।

सच कहा जाए तो भारतीय मतदाताओं का यह ऐतिहासिक जनादेश समकालीन नौकरशाही और न्यायपालिका के मुंह पर किसी करारा तमाचा से कम नहीं था। यही नहीं, यह उन दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक नेताओं और उनको मोहरा बनाकर घृणित चाल चलने वाले सवर्ण नेताओं की फितरतों को भी एक नसीहत था कि या तो देश-समाज हित में बदल जाओ, अन्यथा बदल दिए जाओगे। और गत चार वर्षों के मोदी शासन ने वास्तव में सियासत के बहुत सारे पैमाने बदल दिए।

लेकिन सत्ता की शोहबत के साथ गिरगिट की तरह रंग बदलने वाली हमारी नौकरशाही और न्यायपालिका ने अपने ही उन तमाम अटपटे फैसलों के साथ नए परिवेश के मुताबिक तालमेल बिठानी शुरू कर दी। परिणाम यह हुआ कि गुजरात दंगों 2002 से लेकर कथित हिन्दू/भगवा आतंकवाद के अधिकांश आरोपी बेदाग साबित होने लगे। जो जेल में थे, वे बाहर निकले और रोंगटे खड़े कर देने वाले किस्से भी सुनाए जिसने ब्रिटिश हुकूमत की याद ताजा कर दी। यही वजह है कि इन अभियोजनों में संलग्न एजेंसियों की भूमिका पर तब भी सवाल उठे थे और अब भी उठ रहे हैं। जाहिर है कि सत्ता के आभामंडल में या तो हमलोग तब ठगे गए थे या अब ठगे जा रहे हैं। लेकिन सवाल फिर वही कि ऐसा क्यों, किसके लिए और कबतक? क्या यही लोकतंत्र है? क्या इसी के लिए पूर्वजों ने अपनी कुर्बानी दी थी?

आखिरकार जब नृशंस वारदातें हुई हैं तो कोई तो गुनहगार होगा, जिन्हें या तो तब की जांच एजेंसी ने बचाया था, या फिर अब की जांच एजेंसियां बचा रही हैं। दरअसल, वर्ष 2007 में हुए इस धमाके में जहां 9 लोगों की मौत हो गई थी, वहीं 58 अन्य घायल हुए थे। लेकिन अदालत के फैसले से स्पष्ट है कि जांच एजेंसी आरोपियों के खिलाफ दोष साबित करने के लिए पुख्ता सबूत पेश करने में नाकाम रही। इसलिए पर्याप्त सबूतों के अभाव में सभी पांचों आरोपियों को बरी कर दिया गया।

ऐसा नहीं है कि सिर्फ मैं ही इस बात से चिंतित हूं। वाकई बहुत सारे लोग हैं जो पतित राजनीति को सही राह दिखाने के लिए स्थायी कार्यपालिका, न्यायपालिका और आजाद मीडिया की भूमिका को लेकर सशंकित हैं। गृह मंत्रालय के पूर्व अवर सचिव आरवीएस मणि के उस कथन से कि “फैसला मेरी उम्मीद के मुताबिक ही है, क्योंकि मामले के सारे सबूत गढ़े गए थे। हमले के असली गुनाहगारों को एजेंसी के गलत इस्तेमाल से बचाया गया। यह चिंताजनक है” मेरे अभिप्राय की पुष्टि होती है। इसलिए स्पष्ट है कि तब कांग्रेस सरकार की नीयत में खोंट थी।

हालांकि देश का एक तबका बीजेपी सरकार को भी बिना खोंट का नहीं मान रहा। विपक्षी नेताओं कुछेक नेताओं का तो स्पष्ट आरोप है कि जिस तरह से इस मामले से जुड़े सभी गवाहों को कोर्ट में पेश किया गया, लेकिन अचानक एनआईए मामले को साबित करने में असफल रही, वह चिंता की बात है। लगता है कि वह सत्तारूढ़ पार्टी के दबाव में आ गई है। इसलिए एजेंसी को जवाबदेह होना होगा। यदि वह नहीं होगी तो उसकी जवाबदेही तय किए जाने का माकूल वक्त भी आ गया है। आखिर कब तक ऐसी भ्रामक स्थिति बनी रहेगी, क्योंकि इससे जनहित कदापि नहीं सधेगा।

हैरत की बात तो यह भी है कि इस विवादास्पद मामले में फैसला सुनाने वाले हैदराबाद की विशेष एनआईए अदालत के न्यायाधीश के रविन्द्र रेड्डी ने अपना फैसला सुनाने के कुछ घण्टे बाद ही व्यक्तिगत कारणों के चलते अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इसलिए सवाल उठाने वालों को लोगों को भरमाने का मौका मिल गया। यही नहीं, इस फैसले पर कांग्रेस और बीजेपी में पुरानी नोंक-झोंक भी शुरू हो गई है।

बहरहाल, यह कहना बहुत कठिन है कि प्रशासन की भूमिका और अदालत का फैसला सही है या गलत, क्योंकि यह  जांच एजेंसी की ओर से दाखिल आरोपपत्र, मामलों में पेश गवाहों के बयान और अभियोजन द्वारा उनके परीक्षण के तौर-तरीकों पर निर्भर करता है, जो किसी भी सरकार के हितों के मद्देनजर ही तय की जाती है। जैसी कि इस देश मे अघोषित परंपरा रही है।यही वजह है कि उसके बदलते ही सबकुछ बदल जाते हैं और बहुतेरे लोग हाथ मलते रह जाते है अपने लोकतांत्रिक प्रशासकों की निष्पक्ष भूमिका पर।

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