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कर्नाटक: गठबंधन की ओछी राजनीति से उभरते सवालों का आखिर कौन देगा जवाब?

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तीखी बात/कमलेश पांडे, वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार। कर्नाटक विधानसभा चुनाव में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने, सबसे बड़ी पार्टी के रूप में बीजेपी के उभरने के बावजूद उसके पास आवश्यक संख्याबल नहीं होने, चुनाव बाद बने कांग्रेस-जेडीएस के अवसरवादी गठबंधन द्वारा बहुमत की सरकार बनाने का दावा करने, फिर भी राज्यपाल द्वारा सबसे बड़ी पार्टी के रूप में बीजेपी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करने और सादे समारोह में ही बीजेपी नेता बीएस येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाने जैसी ओछी  राजनीति आज नैतिक विडम्बना वश ही सही, लेकिन बड़े ही दिलचस्प और निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है; जिसके मद्देनजर कतिपय सवाल उठना लाजिमी है।

ऐसा इसलिए कि पूरे घटनाक्रम से क्षुब्ध विपक्ष विशेषकर कांग्रेसी रणनीतिकारों ने आधी रात में ही सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और राज्यपाल के विवेकाधिकार को स्पष्ट चुनौती दी। लेकिन न्यायालय ने सूझबूझ का परिचय देते हुए मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह पर रोक तो नहीं लगाई, फिर दूसरे ही दिन सुनवाई के दौरान उसने जिस तरह से सदन में बहुमत साबित करने की राज्यपाल द्वारा निर्धारित समय-सीमा को एक पखवारे से घटाकर महज चौबीस घण्टे कर दी और  सदन में शक्ति परीक्षण की निगरानी हेतु कुछ आवश्यक दिशा-निर्देश दिए, उससे बीजेपी रणनीतिकारों का गेम प्लान ही चौपट हो गया। यही नहीं, इससे उत्साहित कांग्रेस फिर आधी रात को न्यायालय पहुंच गई और राज्यपाल/सरकार द्वारा नियुक्त प्रोटेम स्पीकर को भी बदलने की मांग रखी, जिससे न्यायालय ने दो टूक असहमति जताई और शक्ति परीक्षण की पूरी प्रक्रिया को लाइव टेलिकास्ट करने का दिशा-निर्देश दिया।

हालांकि सदन में सदस्यों के शपथ ग्रहण पूरे होने के बाद और शक्ति परीक्षण की नौबत आने से पहले के अंतिम क्षण में मुख्यमंत्री येदियुरप्पा ने अपना अत्यंत भावुक भाषण दिया और सदन को अपने इस्तीफे की जानकारी देते हुए राज्यपाल को अपना इस्तीफा सौंप दिया। इससे भले ही कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन की सियासी किस्मत चमक उठी। लेकिन स्पष्ट बहुमत से महज सात-आठ सीटों की कमी के चलते जिस तरह से सूबे की सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी (104) बड़े ही बेआबरू होकर सत्ता से बाहर हो जाने को विवश हुई, और क्रमशः दूसरे-तीसरे स्थानों पर रही पार्टियों के अवसरवादी गठजोड़ यानी कि कांग्रेस (78) + जेडीएस (37) ने फिर से सरकार बनाने की चहलकदमी शुरू कर दी, जबकि सबसे अधिक सीटें हासिल करने वाली पार्टी बीजेपी के मुकाबले उन्हें बहुत कम सीटें मिली हैं और दोनों आपस में जुड़कर ही बहुमत के लायक बनी हैं, के मद्देनजर जनादेश बनाम बहुमत वाले अंकगणित का सवाल एक बार फिर से व्यवस्था के सामने मुखर हो चुका है।

यही नहीं, उससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या ऐसे बनावटी बहुमत की प्राप्ति के लिए चुनाव बाद होने वाले दो या दो से अधिक दलों के गठबंधन से यह पूरा लोकतंत्र महज बनावटी लोकतंत्र नहीं रह जायेगा, जैसा कि विगत चार-पांच दशकों से देखा जा रहा है। क्योंकि अस्पष्ट जनादेश की स्थिति में सरकारें तो जोड़तोड़ कर अपना कार्यकाल पूरा कर लेती हैं या फिर बदल जाती हैं, लेकिन वह जनहित नहीं सध पाता जिसके लिए ये सरकारें बनती-बिगड़ती हैं। कहने का तातपर्य यह कि ऐसा सियासी खेल यदि यूं ही चलता रहेगा या फिर संसद और सर्वोच्च न्यायालय मिलकर कुछ ऐसे माकूल प्रबन्ध करेंगे कि ऐसी ओछी नौबत भविष्य में नहीं आए। क्योंकि राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तिसगढ़ और मिजोरम में इसी वर्ष विधान सभा चुनाव होने वाले हैं, जबकि अगले साल संसदीय आम चुनाव भी  होने वाले हैं। कोढ़ में खाज यह कि इन तमाम जगहों पर भी किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत मिलने के आसार क्षीण नजर आ रहे हैं।

यही वजह है कि शक्ति परीक्षण के दौरान बीजेपी नेता और ढाई दिन के मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने बेहद मार्मिक भाषण  देकर जिस प्रकार से अपने इस्तीफे का अचानक ऐलान किया, वह चौंकाने वाला है। इससे उनकी सियासी मजबूरी के अलावा भावी रणनीति की भी स्पष्ट झलक मिलती है। एक तरह से यह पूरा वाकया ही बीजेपी का इमोशनल गेम प्लान प्रतीत हो रहा है। भले ही इससे चुनाव बाद बने कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन की क्षणिक जीत हुई है, क्योंकि इस पूरे मामले को सर्वोच्च न्यायालय में ले जाकर वह जो हासिल करना चाहती थी, उसे वह सबकुछ अब मिल जाएगा। लेकिन उसे यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि सदन या उससे बाहर धर्मनिरपेक्षता बनाम साम्प्रदायिकता के सवाल पर जब-जब स्पष्ट ध्रुवीकरण हुआ है, तब तब बीजेपी सदन में हारकर भी उसके बाद हुए चुनावों में पूरी मजबूती से उभरी है और भारी मतों से जीत कर अपनी सरकार कई बार बना चुकी है।

यही वजह है कि इस बार भी विश्वास मत हासिल करने के मौके पर सदन में मुख्यमंत्री येदियुरप्पा ने किसानों और कार्मिकों आदि की बात करते हुए सूबे के सुलगते हुए सवालों का जिक्र किया और आने वाले दिनों में राज्यव्यापी दौरे करने का स्पष्ट संकेत दिया है जिससे उनके मजबूत चट्टानी इरादों का पता चलता है। खैर, यह तो बाद की बात हुई लेकिन फिलवक्त बहुमत के आंकड़ों के खेल में जिस तरह से मौलिक जनादेश की मूलभूत भावनाओं का अपमान हुआ है, उसने अवसरवादी और धर्मनिरपेक्ष सियासी ताकतों की कलई ही खोल दी है। क्योंकि चुनाव में तो वे एक-दूसरे को लांछित करते हैं, लेकिन चुनाव बाद बीजेपी को सत्ता में आने से रोकने के लिए एकजुट हो जाते हैं ताकि उनका अल्पसंख्यक वोट बैंक महफूज रहे।

इस बार खास बात यह कि धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक ताकतों के परोक्ष प्रभाव में काम कर रही सर्वोच्च न्यायपालिका की सियासी भूमिका भी आने वाले दिनों में सवाल उठेंगे, क्योंकि यह अब और बढ़ने वाली है। निःसन्देह हालिया घटनाक्रम इस बात की स्पष्ट चुगली कर रहे हैं कि उसके द्वारा दिए गए ताजा दिशा निर्देशों से न केवल राज्यपाल पद की गरिमा घटी है बल्कि आने वाले दिनों में होने वाले सियासी नाटकों में भी न्यायिक हस्तक्षेप बढ़ेगा। जाहिर है कि भारतीय राजनीति अपने मूल उद्देश्य से भटक चुकी है और महज सत्ता प्राप्ति के लिए जिस अनैतिक जोड़तोड़ को वह बढ़ावा दे-दिला रही है, उससे उसकी भावी दशा और दिशा समझने में कोई ज्यादा मुश्किल किसी को भी नहीं आ रही है। इसलिए जनमानस की बेचैनी और बेसब्री गौर करने के लायक हो या न हो, लेकिन सत्ता प्रतिष्ठानों की मारामारी और आपाधापी उन्हें पूरी तरह से बेनकाब कर चुकी है।

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