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समीक्षा फिल्म एक शातिर गुनहगार

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फिल्म: एक शातिर गुनहगार
बैनर: ए पी ए प्रोडक्शन
निर्माता निर्देशक लेखक: एस के अमृत
डी ओ पी: विकेश राज
कोरियोग्राफर: बॉबी
एडिटर : एस के बहाड़ी
प्रोडक्शन कंट्रोलर : सुधांशु
गीतकार : एस के अमृत
संगीतकार : पिंटू प्रवीण
मुख्य कलाकार : जयंत कुमार अमृत, अनिल धवन, रूपा सिन्हा, नाज़िया गुल, कल्पना शर्मा, साधना, कशिश, पूजा,प्रिया, अर्जुन ग्रोवर, मऊ पटेल, स्टार बबलू, गौतम गिरी, संजय हित, प्रकाश और नितेश आदि।

संदेश परक सस्पेंस फिल्म-‘एक शातिर गुनहगार‘ आम लीक से हट कर बनाई गई है। इस फिल्म की कहानी दो दिलों की दास्ताँ है। ऑफिसर राणा और सिमरन एक दूसरे से बेपनाह मोहब्बत करते हैं। जब सिमरन को अपने प्रेमी को रिश्वत लेने को प्रेरित करती है लेकिन राणा उसकी बातों को नहीं मानता है तो उससे अलग हो जाती है। राणा सिमरन को समझने का प्रयास करता है परंतु जब वो नहीं मानती है तो एक दिन राणा जबरदस्ती बलात्कार करने के क्रम में सिमरन की हत्या कर देता है।

इसके बाद राणा कई लड़कियों को अपने जाल में फंसाता है और अपना काम निकलने के बाद उसकी हत्या कर देता है।इसी दरम्यान एक लड़की पूनम उसकी ज़िन्दगी में आती है।पूनम के साथ भी राणा जबरदस्ती बलात्कार करने की कोशिश करता है,उसी क्रम में पूनम अपने पेट में काँच की बोतल मार कर  आत्महत्या करने का प्रयास करती है और गंभीर रूप से जख्मी हो कर बेहोश हो जाती है। राणा उसे मरा हुआ समझ कर फरार हो जाता है।इसके बाद फ़िल्म का क्लाइमेक्स शुरू हो जाता है। पूनम अपने बयान में सारी बात डी एस पी को बताती है और राणा को मुजरिम साबित करने का प्लान बनती है।वह पूनम की आत्मा बन कर राणा का पीछा करती है।राणा उसके जाल में फँस जाता है। कोर्ट में बार बार सवाल किये जाने पर राणा अपना जुर्म क़बूल कर लेता है और उसे सजा हो जाती है।जेल में ही रहते हुए सिमरन के मामले में भी राणा अपना जुर्म क़बूल करता है।इस मामले में राणा को मौत की सजा मिलती है।

बिहार शरीफ निवासी फिल्मकार एस के अमृत की यह फिल्म एक ऐसी फिल्म है जिसे व्यावसायिक नहीं कहा जा सकता है और न ही इसे कला फिल्म की श्रेणी में रखा  जा सकता है। क्योंकि व्यवसायिक फिल्म और कला फिल्म में अन्तर है। व्यवसायिक फिल्म में नग्नता, कामुकता, नृत्य और मार-धाड़ प्रचलित हैं। कहानी और भावनाओं का कोई अस्तित्व नहीं होता है। कला फिल्म में तकनीक और कला सबसे अहम है जिसकी केवल छाया आंशिक रूप से फिल्म-‘एक शातिर गुनहगार‘ में प्रतिलक्षित होती है। महिलाओं के उत्थान पर जोर देती यह फिल्म जन जीवन से जुड़ी एक वास्तविक फिल्म प्रतीत होती है।जिसका मूल उद्देश्य समाज में जन जागरूकता अभियान को गति देना है जिससे वर्तमान प्रशासनिक व व्यवहारिक व्यवस्था में त्वरित गति से सुधार हो।

मध्यांतर के बाद इस फिल्म का शेष हिस्सा अन्य फिल्मों के समान है जिसमें रोमांस,एक्शन,कॉमेडी और ट्रेजडी शामिल है।कर्णप्रिय गीतों से सजी इस फिल्म का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा न्यायालय का दृश्य है। जहां एक ईमानदार और अत्यंत जिम्मादार पुलिस निरीक्षक अपनी प्रेमिका की हत्या के मुकदमे का सामना कर रहा होता है। इस फ़िल्म के माध्यम से सन्देश देने का प्रयास किया गया है कि बुरे कर्मों का फल बुरा ही होता है। बेशक, यह फिल्म देखने योग्य फिल्म है जिसमें अत्यन्त आकर्षक दृश्यों का चित्रांकन किया गया है।बहुत ही दिलकश अंदाज़ में सिने दर्शकों के बदलते हुए टेस्ट को ध्यान में रखते हुए फिल्मकार एस के अमृत ने अपनी कल्पना को पर्दे पर साकार किया है।यह फिल्म बहुत जल्द ही बिहार और झारखंड में प्रदर्शित होने वाली है।

समीक्षा : काली दास पाण्डेय

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