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धारा 144 के बावजूद सरेआम पारंपरिक हथियार और तमंचों का प्रदर्शन

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आलेख: नितेश कुमार चौधरी, जन्दाहा।  वैशाली की महत्ता विश्व परिक्षेत्र में सर्वव्यापी है जिसके कण-कण में राम, कृष्ण, गौतम, महावीर,हजरत साहब और स्वयं महाराज वैशाल के भाई-बंधुत्व, सहभागिता, समांयस,और न्यायिक पवित्रता का विरासत मौजूद हैं । वैशाली की घरती ने ही विश्व में लोकतंत्र का सम्राज्य कायम कराया ।जहां राजाओं की विरासत ध्वस्त हुई, वहीं प्रजा का राज कायम हुआ।

आज अपने पूर्वजों के इस अमुल्य थाती को कलंकित होते देखना इंसानी वेदना बन गया है। जिसकी फिक्र न तो शाषन-प्रशासन को है और न ही समाजीक नेतृत्व कर्ता को। आजादी के आङ में कुकुरमुत्ते की तरह उपजती नेतृत्व संगठनों ने मोहब्बत को अपवित्र कर आराजकता का महौल कायम कर दिया। शांति और सौहार्द का हरण कर लिया। इतना ही नहीं राजसिंहासन के विरूद्ध क्रांति का शंखनाद करने वाली वैशाली की धरती की रक्तरंजित कर दिया जिसकी दूरगामी परिणाम आने की संभावनाओं ने शांति समर्थकों के मन को भयात्म करते जा रहा है।

अब सवाल उठता है कि आखिर मेरा नेतृत्व मुझे कहां ले जाना चाहता ? क्या देश अभिव्यक्ति के आजादी में जलती रहेगी और नेतृत्व वोट बैंक की जूगात में जूगली करता रहेगा? आखिर कब तक उन अमुल्य कुर्वानीयों का दफन होते देखता रहेगा देश, जिसने अपने यौवन का , माँ ने ममता का , धार्या धार्य सिंदूर का, तो बहन ने भातृत्व प्रेम का परित्याग कर स्वतंत्र भारत का इतिहास लिखा हो ? ये कुर्बानी इसलिए नहीं थी कि आप खादी को क्रिचदार बनाए रखने के लिए खंडित खेल को पल्वित करते रहें, बल्कि कुर्बानी सोने के अतुल्य भंडार को संरक्षित रखने के लिए थी।

हिंद का सोना शांति सौहार्द का विश्व संदेशक होने के साथ-साथ गीता के कर्मचेतना को जागृत करने वाला था। आज पुनः अंग्रेजों के जाने के बाद खाकी वाले सोना लूट-लूट कर मालो-माल हो रहें है और हम उसके उकसावे में तलवार और बंदूक के बदौलत अपने खुन का कत्ल करने में मशगूल है। घृणा हो रही है अपने राजनेताओं पर और घृणित हो रहा जनतंत्र।आखिर क्यों हम खुन के इतने प्यासे हो गए हैं, जिसके चलते अपनों की पहचान भूल गए ? मैं मानता हूँ कि चंद पाकिस्तानी पैरोकार होंगे, लेकिन इसमें भी दो राय नहीं है कि कुछ चीनी पैरोकार भी मौजूद हैं ।

आखिर क्यों नहीं बहुल्य वर्ग इन दोनों की सरारत को समझने के लिए तैयार है ? ये देश भारत कटुता का परित्याग चाह रही है, जिसका त्याग कर ही हम देशभक्त कहला सकते। जय श्री राम, अल्ला हो अकबर, भारत माता और वंदेमातरम कह देने मात्र से ही देशभक्त नहीं हो सकते। ये कहने की नौवत छद्म संगठनों के कृतों के कारण आई है क्योंकि इनकी महत्वाकांक्षाओं में शांति स्तंभ गिर रहा है।

अपरिहार्य विषलेशण विगत दो दिनों से रक्तरंजित होकर कराह रही वैशाली से सारगर्भित है जिसकी मूलता वोटों की विसात पर खेली जा रही खुनी खेल से है। आखिर क्यों अंग्रेजों के अत्याचारी राज के विरूद्ध कुर्बानी देने वाले वैकुंठ शुक्ला की शहादत स्थल अपनों के खुन का प्यारा हो गया ? आखिर क्यों अत्याचारीयों के विरुद्ध हथियार उठाने वाले योगेंद्र शुक्ला की घरती अपने के विरूद्ध हथियार लेकर खुलेआम घूम रहा ? आखिर राम- रहीम और कृष्ण-अल्ला को अपने भक्तों से हथियार पर्दशन की अपेक्षा बढ गई ? आखिर क्यों नहीं मेरा नेतृत्व ऐसे किसी भी हथियार को लहराने पर स्थाई रोक लगा रहा ? क्या केवल बंदूक से ही हत्या संभव है, तलवार और भाले से नहीं, जिसे खुली पर्दशन की छूट मिली है ?

इस तरह के पर्दशन चाहे जिस किसी भी समुदाय के द्वारा की जाती हो उसमें राजनीतिक हनक मौजूद होता। उसके संरक्षक हमारे राजनेता होते है, जिसके सम्मान में वर्दी मौन रहता और घरती रक्तों से सजती रहती ।इंसान कालग्राही बनता, ममता लूटी जाती, तो अरमानों का दफन हो संस्कृति का क्षरण होता। धिक्कार है ऐसी परंपराओं की जो हमारी खुनों से खेलती हो ! धिक्कार है वैसे अल्ला और भगवान को, जिसने हमसे हथियार पर्दशन की अपेक्षा की हो ! आखिर वो कौन सा धर्म है जिसमें इस तरह का बंधन व्याप्त हो कि मेरा अराध्य नशाओं के संग हथियारों के पर्दशन से खुश होगा। ये ढकोसलेवाजी बंद होनी चाहिये। धर्म और परंपराओं के नाम पर इस तरह की नग्न नृत्य की अनुमति शासनिक व्यवस्थाओं के विसंगतियों में निहित है। जिसपर अंकुश लगाने की आवश्यकता है। लेकिन ये तबतक संभव नहीं है जबतक की हमारे राजनेता राजनीतिक रोटी सेंकने का काम करते रहेंगे ।

ये नौवत भी वैशाली जिला के मुख्यालय हाजीपुर में इंसानों को इंसुलिन का सहारा लेने के कारणों से आ गई। शांति और न्याय का द्योतक मुहर्रम खुन से लथपथ हो गया। अखाड़े की अखाङियत अङीयल होकर खुन का प्यासा बन बैठा। आरोपों के शीलशीला संभानाओं को तलाशती रही और अंततः हुआ भी वहीं, जिसकी बुनियाद रची जा रही थी । मैं प्रशासन के कारवाई पर कोई सवाल खङा करना नहीं चाहता, लेकिन लहकती आग में टपकती प्रशासनिक पेट्रोल ने मौका दिया है। आखिर जब जलती हाजीपुर की आग को बुझाने में हजारों की संख्या में सैन्य कर्मीयों की तैनाती करनी पङी, तो फिर किन हालातों में धारा 144 लागू रहने के बावजूद तजीया जूलूस की अनुमति दी गई? हाजीपुर के नगर परिषद क्षेत्र में निकाले गए तजीया जूलूस के दौरान किन परिस्थितियों में पारंपारिक हथियारों के अलावे असलहों का नग्न पर्दशन हुआ ? आखिर वो पर्दशन क्या संकेत देना चाह रही थी ? आखिर प्रशासन उस जूलूस के साथ थी या नहीं, यदि हाँ तो क्या कारवाई की और यदि नहीं तो किन हालातों में असंवेदनशील बनी रही ? जबकि हाजीपुर जल रहा था। निश्चित रूप से प्रशासन की ये लापरवाही सवालों के अहदे में आकर शांति व्यवस्था का व्यवधानक है । जिसके प्रशासनिक निष्पक्षता संदिग्ध होती।

मैं समुदाय विशेष में वैमनस्यता का बीजारोपण कर राजनीतिक अस्तित्व कायम करने की नियत रखने वाले को सावधान करना चाहता हूं कि आतंक की वेदी पर राज्याभिषेक की आकंक्षा का त्याग कर दें क्योंकि आतंक राजक कभी नहीं बन सकता। वहीं आम -अवाम से भी हमारी अपील है कि हमारी धर्म कर्मचेतनी है, जिसकी अंधता विनाशक हो सकता है। इसलिए अपनी धर्मों के मूलता की ओर लोटे तथा कर्मयोग जगाये। राम ने सीता हरण की गाथा रचने के लिए किसी परंपरा को नहीं अपनाया था, बल्कि धर्मगत् कर्मों को अम्लात कर रावण राज का अंत कर विभिषण राज का उदय किया। इसलिए आपसे निवेदन है कि सोशल मीडिया के झगङालू झंझबातों से स्यंव को विलग कर वैशाली की गौरव को कलंकित करने का कर्ता नहीं बनें।

हिंदू, मुस्लिम, सिख ,इसाई, सब मिलकर है भाई भाई !
रहेगी देश की शान बनी, हमारी एकता आन बनी !! जय भारत, जय बिहार, जय वैशाली

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