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अपने आराध्य के संदेश को जीवन दर्शन बनाने में संकोच न करें: नितेश चौधरी

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आलेख: नितेश चौधरी। संभव है हमारी सोंच छोटी हो, मुझमें दूरदृष्टि का आभाव आ गया हो, चापलूसी की घोर किल्लत आ गई हो, राजनेताओं के वास्तविक चरित्र मेरे मस्तिष्क में प्रवेश कर गया हो, जिसके चलते आप मुझे नाकारात्मक सोंच वाला या फिर नास्तिक कह सकते हो, लेकिन यथार्थ के परिधि में आप प्रपंची के अलावे कुछ नहीं हो। मैं आपकी सोंच से बेफिक्र हो अपनी आत्मीय अभिव्यक्ति को व्यक्त करने में संकोच नहीं करता, क्योंकि हलधर ही वास्तविक सेवक था, वंशीधर धर तो केवल किरदार। जिसकी जयकार होती है।

सांस्कृतिक इतिहास कर्मवीरों पर सारगर्भित है। हमारे इतिहास पुरूषों ने मुझमें कर्मचेतना जाग्रति करने का प्रयास किया। जिन्हें हम देव और देवी कहते हैं। जिनके समक्ष खङे होकर, बैठकर, आँख बंद कर, माला हाँथ मे लेकर, यदि संभव होता तो ढोलक-झाल बजाकर “राम राम रामे राम,श्री कृष्ण हरे कृष्णा जैसे धुन पर थिरकते है। मंदिर- मस्जिद के गुंबज पर तीब्र ध्वनि की यांत्रिकी लगा ध्वनि प्रदूषण तो फैलाते ही है, लाखो-करोड़ों रूपये लूटा कर लाचारों को भूखे मरने पर विवश करते हैं।

आखिर उन बेघर, नंगे, और भूखे मरने वालों के लिए कहाँ चला जाता है आपका भगवान और अल्लाह हो अकबर ।भगवान और अल्लाह ने हमें कर्म संस्कृति का संदेश दिया, जिसका परित्याग कर ढकोसले की प्रपंच को अम्लता देकर नूर जीवन को नीर का उपहार समर्पित करने में जुटे हैं।

अब सवाल उठता है कि आखिर हम कैसे नहीं करे ? कीजिए खुब कीजिए, लेकिन अपने आराध्य के संदेश को भी जीवन दर्शन बनाने में संकोच नहीं कीजिये ।अरे किस बाबा और मुल्लाओं की भरोसे मे हम अपनी मूल संस्कृति को खोते जा रहे हैं,उसी के जीवन मासूमों के जिंदगी के साथ खिलवाड़ करता, उसी के जो मेवा-मिष्ठान और गोस का आनंद भोग कर बलिष्ट काया का सृजन कर दुष्कर्म और अनैतिक कार्यों को अंजाम देता, उसी के जिसने लाखों-करोड़ों की हमारी गाढी कमाई का दुरूपयोग करवा कर भूख और रोग से मरने पर विवश करता ।आखिर ये कैसी संस्कृति हैं हमारी जिसकी मूलता को हम आज तक नहीं समझ सके ।

अब सवाल उठता है कि आखिर हम समझेंगे भी कैसे ? दूरदर्शीयों ने कहा है कि लम्बी सत्ता सुख भोगने के लिए प्रजा को अशिक्षित करना जरूरी है और इन्हीं सिध्दांत के सहारे भारतीय शासक सत्ता सुख में लगें हैं। वाह्य आडंबर कि मखमली सेज पर सयनासित करा भारत भविष्य को सलाखों में डाल कैद मौत की सजा दी जा रही और हम नासमझ बन हँसते-हँसते सजाये मौत को कबूल करते । मेरा शासक ही मेरा वास्तविक भक्षक है, इन सत्यों से हम अनभिज्ञ बने हैं ।

आखिर ये कहने की नौवत कैसे आ रही हैं ।हमारे आपके मन को भ्रमित कर दिया होगा ।स्वभाविक है, आपनी ही आस्था पर कटाक्ष प्रतित हो रहा है ।मैं स्पष्ट रूप से कहना चाहता हूँ कि मैं पूर्ण आस्तिक और भगवान -अल्लाह पर भरोसा रखने वाला हूँ ।लेकिन मेरा सवाल ये नहीं कि आप पूजा क्यों करते, नामाजी क्यों हो, लेकिन सवाल ये है कि जिनकी पूजा और नामाजी करते हो, उनके आदर्श कर्म को भी अपनी जीवन क्रियाओं में क्यों नहीं सामिल होने देते हो?

मेरा सवाल राम, कृष्ण और अल्लाह से नहीं है, बल्कि सवाल अपने शासक से, देश के नुमाइंदों से हैं कि आखिर वो मुझे किस दुनिया में ले जाने की तैयारी कर रहा है ?आखिर क्यों वो जात-जात ,धर्म-धर्म और अब संस्कार-संस्कृति में बाँट कर मेरा शोषण करना चाह रहा है ?
आये दिन संस्कृति और महापुरुषों को महिमामंडित करने की जो शिलशिला और उस पर आने वाली लागत पूँजी ने हमें निराश की ओर ढकेले जा रहा है । मैं विरासत और वर्तमान के बीच भेद करने की स्थिति में नहीं हूँ ।क्योंकि वर्तमान में भी अच्छे प्रतिफल के बावजूद निराशा का खंडहर समाहित है।

मुझे अत्यधिक जानकारी का आभाव है।इसलिए मैं हालिया घटना का कुछ जिक्र करना चाहता हूँ। सत्ता के चार साल की अवधि को पूरा करने वाले, विश्व विरादरी को भारत की धमक से सोचने पर मजबूर करनेवाले भारत के शक्तिशाली प्रधानमंत्री माननीय नरेन्द्र मोदी जी का आगमन शताब्दी सत्याग्रह समारोह में हुआ। कालातीत में शताब्दी समारोह जिले की पांच-पांच चीनी मिलें बंद है। इस समारोह में सरकार ने एक दिन में लगभग 200 करोङ रूपये खरीद किया है। लगभग पंद्रह दिनों तक बिहार विकास के अन्य कामों से वंचित रहा।मुझे इन सब चीजों से भी कुछ लेनादेना नहीं है, लेकिन चुनाव के वक्त मोतीहारी के सभा में प्रधानमंत्री ने जनता से जो वादा किया था, वो तो पूरा होना चाहिये था। बिहार और मोतीहारी का कल्याण शताब्दी समारोह की चकाचौंध रोशनी से नहीं हो सकती, बल्कि बंद चीनी मीलों के चालू होने से होती। एक दिन के खर्च 200 करोड़ में मोतीहारी के तीन-तीन चीनी मीलों अनवरत समय के लिए चालू हो जाती ।अब महात्मा गांधी के डेढ़ सौ वर्ष पूरे होने पर समारोह होने वाली है ,इसके बाद——- लगातार हमें और मुर्ख बनाने वाली सौगातें मिलतें रहना है ।

जनसेवक से बने लोकसेवक विधायक और सांसद के वेतन सहित अन्य फिजूलखर्ची को एक साथ कर देने पर देश के लगभग आधी आबादी को भोजन, वस्त्र और मकान के लिए लालायित नहीं होनी पङेगा। आखिर क्या आवश्यकता आ पङी की याजनाओं का माननीय अपने लावलसकर के साथ शिलान्यास और फिर उद्घाटन करें। उसमें आने वाली लागत को विभागीय पदाधिकारी या ठेकेदार भरपाई करें। बदले में योजनाओं की गुणवत्ता को नजरअंदाज किया जाए। इन व्यवस्थाओं के जटिल जंजीर को देखने के बाद एक कहावत चरितार्थ होती दिखती हैं “अँधेरे नगरी, चौपठ राजा”।

भारत में जन्मित बच्चे प्रतिदिन 100 रूपया कर में चुकता करते हैं, जबकि मनरेगा के मजदूर को 171 रूपये मजदूरी मिलती। फैक्ट्री में काम करने वाले को घोड़े की तरह काम करने पर 300 रूपए मिलता और सौगात में यक्ष्मा रोग। हमारे रहनुमा पांच लाख की तनख्वाह लेते, अपने विकास फंड का ग्राहक ढुंढते, 180 रूपये लीटर की पानी से पैर धोते। हमें भूखमरी से बचाने के बदले ताजमहल की रेशमी सूरत दिखलाते, फिर भी वो मेरे भगवान हैं।

आवश्यकता है सत्य, सारगर्भ, कर्मवोध प्राप्त करने और अतिआस्था के समंदर से वाहर आने की, ताकि हमारी समुचित विकास हो सकें ।देवी-देवताओं के मंदिर में कसमें खाने वाले को हमने मरते नहीं देखा, लेकिन जिन्हें उन कसमों से भरोसे में लेकर प्रतिधात किया गया, वो प्रतिदिन कालग्रासि हो रहे है। भावना के तलहटी पर ही हत्या को अंजाम दिया जा सकता ।

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