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मन की बात वाणीश्री के साथ

अंकित के ऑनर किलिंग से जुड़े अनसुलझे सवाल

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आलेख: कमलेश पांडे, वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार। देश विशेषकर उत्तर भारत में ऑनर किलिंग और इसकी रोकथाम का सवाल किसी यक्ष प्रश्न से कम नहीं है। जिस तरह से राजधानी दिल्ली स्थित ख्याला के रघुवीर नगर में गुरुवार की रात कथित प्रेम-प्रसंग के मामले में एक युवती के परिजनों द्वारा युवक 23 वर्षीय फोटोग्राफर अंकित की नृशंस हत्या गला रेत करके कर दी गई, उससे उपजे ‘ऑनर किलिंग’ जैसे दुर्दांत सवाल ने एक बार फिर से हमारे धर्मनिरपेक्ष समाज के जेहन को कुरेद के रख दिया है। यूं तो देश-प्रदेश में गाहे बगाहे ऐसी घटनाएं आम हैं, लेकिन यह घटना बिल्कुल ही अलग प्रकृति की है जिससे अमनपसंद लोगों का मन-मिजाज कुछ ज्यादा ही सुलगा रहा है।

सवाल है कि जब दो साल पहले ही युवती के परिजनों को उनके बीच के प्रेम सम्बन्धों की भनक लग गई थी, क्योंकि दोनों के घर के बीच की दूरी मात्र 100 मीटर ही है, जिससे ऐसा होना स्वाभाविक भी है, तो फिर इसे रोकने के लिये उनलोगों ने क्या पारिवारिक-सामाजिक उपाय किये। दरअसल ऐसे मामलों में कानून भी बालिग जोड़ियों के पक्ष में ही काम कर रहा होता है, इसलिये प्रभावित परिजनों को ऑनर किलिंग का रास्ता सबसे आसान और उनके लिए त्वरित न्याय जैसा होता है, जो कि अपने देश के लिये सबसे बड़ा अन्याय समझा जाता है और भारतीय दंड संहिता में इसके लिये कड़े  कानूनी उपाय किये गए हैं।

ज्वलंत प्रश्न है कि अंकित की प्रेमिका जब पारिवारिक विवाद वश गुस्से में लड़की अपने घर से चली गई, जिससे अंकित और उसके परिजन भी पूरी तरह से अनभिज्ञ थे, तो फिर युवती के परिजनों ने सिर्फ आशंका वश तल्ख हठधर्मिता क्यों दिखाई? जिस तरह से युवती के परिजनों ने अंकित को इस पूरे मामले का जिम्मेवार ठहराते हुए उसके परिजनों को अपने घर बुलाया और फिर उनसे दुर्व्यवहार किया। इस बीच जब उन्हें बचाने के लिये अंकित दौड़ा तो सरेआम चाकुओं से गोदकर उसकी हत्या कर दी और अंकित के परिजनों को भी घायल कर दिया। घायल मां-बाप ही उसे ऑटो से अस्पताल ले गए, जहां उसने दम तोड़ दिया। इस क्रम में अंकित के दोस्त और तमाशबीन लोगों का मूकदर्शक बने रहना भी कम हैरतअंगेज नहीं है। बेशक यह किसी सामाजिक त्रासदी का सूचक है।

दरअसल, युवती के बयान से भी इस बात की अब पुष्टि हो चुकी है, जिसे मजबूरी वश छाया गृह भेज दिया गया है, क्योंकि परिजनों से उसके जान को भी खतरा है। यही वजह है कि इस मामले की प्रकृति और परिस्थिति ने हमारी सामूहिक सोच और विधि-व्यवस्था दोनों को कठघड़े में खड़ा कर दिया है। इससे यह भी स्पष्ट है कि यदि पड़ोसियों ने भी अपना सामाजिक धर्म निभाया होता और तत्क्षण हस्तक्षेप करके पुलिस को बुला लिया होता तो इतनी बड़ी और जघन्य वारदात नहीं हो पाती। इसलिये इस घटना ने हमारी सामाजिक सोच और संवैधानिक जनसरोकार दोनों के ऊपर कुछ सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। लेकिन इन जैसे ज्वलंत सवालों के जवाब न तो पहले मिले हैं, न तो इस बार मिलने के आसार हैं, क्योंकि हमारी व्यवस्था वोट की कुत्सित राजनीति में उलझकर बिल्कुल संवेदना शून्य हो चुकी है और बिगड़ैल बयानबाजी या फिर शातिर सन्नाटे को अभिशप्त भी।

क्या आपने कभी सोचा है कि सामाजिक और साम्प्रदायिक सद्भाव की ढपोरशंखी उद्घोषणाओं से उत्साहित जब दो पड़ोसी जवां दिल आगे बढ़ते हैं, तकरीबन दो वर्षों के परस्पर अथक परिश्रम से जब उनकी प्यार की बगिया गुलजार होने को आती है तो कभी एक पक्ष तो कभी दोनों पक्ष के अभिभावक की घिसी-पिटी सोच कभी युवक पर, कभी युवती पर, कभी दोनों पर किसी बज्रपात की तरह टूट पड़ती है और जानलेवा बन जाती है। इस मामले में भी ऐसा ही हुआ है, क्योंकि ऐसे प्रेम प्रसंगों से उद्वेलित परिवार को पीढ़ी दर पीढ़ी से उन पर थोपे जा रहे संवैधानिक सोच, से कोई खास वास्ता भी नहीं रहता, क्योंकि अंतर्जातीय-अंतर्धार्मिक विवाह की ओर पग बढ़ा चुकी उनकी संतान उनकी उस पुरातन सोच और खानदानी प्रतिष्ठा को कुचलती प्रतीत होती है, जिसे कुचलकर फेंक देना उनकी मजबूरी या फिर शौक हो जाता है। इससे आवेशित व्यक्ति, उसका परिवार और कभी कभी उसका समाज भी इसकी भारी कीमत चुकाने को तैयार रहता है।

पहला सवाल यह कि कभी हिन्दू, कभी मुसलमान बनकर जो लोग खुलेआम कत्ल करते फिर रहे हैं, उन हत्यारों पर आखिरकार किनकी मेहरबानी है और यह सिलसिला कब थमेगा, कैसे थमेगा और कौन थामेगा? भले ही हमारी संवैधानिक सोच कितनी भी अच्छी क्यों न हो, लेकिन जब तक सभी लोगों द्वारा उसका समान रूप से व्यवहारिक उपयोग नहीं किया जाता, उसकी व्यवहार्यता और सरकारी ढुलमुलता पर लोगों के मन में संदेह और गहरायेगा!

दूसरा सवाल यह कि जातीय उत्पीड़न वश रोहित वेमुला (आंधप्रदेश) की आत्महत्या और साम्प्रदायिक तांडव के चलते हुई कहीं अखलाख, तो कहीं चंदन (दोनों उत्तर प्रदेश) की हुई नृशंस हत्या और उसको लेकर की गई अलग-अलग तरह की परस्पर विरोधाभाषी राजनीति हमारे हुक्मरानों की जो जलालत भरी कहानी कहती है, उसका निराकरण क्या है, कैसे होगा और करेगा कौन? आखिरकार इस बात की गारंटी कौन देगा कि हमारे जेहन में पैठ बना चुकी जातीय घृणा भाव और सांप्रदायिक उन्माद वश गाहे बगाहे जो  घटनाएं होती रहती हैं वो अब भविष्य में नहीं होंगी।

तीसरा सवाल यह कि हमारे कतिपय नेतागण जो जातीय समीकरणों और उससे होने वाले चुनावी लाभ-हानि के मद्देनजर जो घटनास्थल का दौरा करते हैं, फिर ऊटपटांग बयानबाजी करते हैं, और सामाजिक विभाजन का कारक बनते हैं, जिससे इस प्रकृति की घटनाओं को प्रश्रय मिलता है, उसे रोकने की जिम्मेवारी किनकी है। आखिरकार सामाजिक स्थिति के इतना विस्फोटक हो जाने के बाद भी यदि ये लोग नहीं चेतेंगे तो फिर आगे के हालात और भी बदतर होंगे, इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता।

सबसे बड़ा और अंतिम सवाल यह कि मॉडल बनकर नाम और पैसा कमाने की उसकी जो चाहत अधूरी रह गई, वह उसके बूढ़े मां-बाप को भी आजीवन खलेगी, क्योंकि उनके बुढ़ापे का जो सहारा चला गया? जो समाज उनके बेटे को बचा नहीं पाया, वह उनकी कैसी देखभाल करेगा, समझा जा सकता है।

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