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सार्क देशों में अपने हितों की रक्षा कैसे करेगा भारत?

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आलेख :कमलेश पांडे, वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार। सार्क देशों में राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने और उससे उत्पन्न विप्लवकारी परिस्थितियों का लाभ उठाना किनकी फितरत है, अब यह बात किसी से छिपी हुई नहीं है। मालदीव, श्रीलंका, पाकिस्तान और नेपाल जैसे सार्क देशों के प्रत्यक्ष-परोक्ष अलोकतांत्रिक हालात तो इस बात की खुलेआम चुगली कर रहे हैं। शेष बचे सार्क देशों यथा- अफगानिस्तान, भूटान, बांग्लादेश के प्रति भी चीन की रणनीति जगजाहिर है। लिहाजा, इन देशों के सामरिक महत्व वाले ठिकानों को वह रणनीतिक रूप से हथियाये, उससे पहले ही भारत को अपने दूरगामी क्षेत्रीय हितों की रक्षा के लिए कमर कसकर लामबंद हो जाना चाहिये। अब भी यदि वह चाक-चौबंद होकर पलटवार नहीं करेगा, तो निःसंदेह इतिहास उसे और उसके नेतृत्व को कतई माफ नहीं करेगा।

सिर्फ सार्क के आठ देश ही क्यों, आसियान के दस और दर्जनाधिक अरब देशों पर भी इस क्षेत्र की मजबूत आर्थिक और सैन्य शक्ति भारत का पहला और प्राकृतिक हक बनता है। बावजूद इसके, सर्वे भवन्तु सुखिनः और वसुधैव कुटुम्बकम की जनकल्याणकारी भावना रखने वाला भारत किसी पर भी अपनी मनमर्जी नहीं थोपता। इसलिये चीन, रूस व अमेरिका जैसे वैश्विक महत्वाकांक्षी देशों को चाहिए कि वह भारतीय उपमहाद्वीप व उसके आसपास के छोटे-बड़े मुल्कों में परस्पर घाती-प्रतिघाती रणनीति लेकर फटकें, उससे पहले भारत को विश्वास में ले और लोकतंत्र की भारतीय परिभाषा में विश्वास करें, उसका अनुकरण करें।

कहना न होगा कि यदि वे ऐसा नहीं करने की हिमाकत करते हैं तो भारत में इतना सामर्थ्य होना चाहिए कि वह अपने क्षेत्रीय व एशियाई हितों की रक्षा मज़बूतीपूर्वक वैश्विक कूटनीतिक नजरिये से कर सके, देश-दुनिया के किसी भी रंगमंच पर। निःसंदेह इस स्थिति को पाने के लिये हमारी नीतियां भी ऐसी होनी चाहिए कि सार्क, आसियान और अरब देशों की जनता भारत की नेकनीयती पर आंख मूंदकर विश्वास कर सकें। भले ही पक्ष-विपक्ष प्रेरित उनके नेतृत्व में विरोधाभास ही भरा क्यों न हो, क्योंकि लोकतंत्र में इसकी गुंजाईश हमेशा बनी रहती है। निःसंदेह, भारत के लिये यह गर्व का विषय है कि उसके प्रति भी देश-दुनिया का नजरिया अब भी ऐसा ही है, अपवादस्वरूप पाक-चीन के शासक वर्ग को छोड़कर।

हालिया इतिहास पर यदि आप नजर दौड़ाएंगे तो पाएंगे कि  चाहे भारत का पुराना और वफादार मित्र रूस हो या फिर नया रणनीतिक दोस्त अमेरिका, जब भी उसने हमारे क्षेत्रीय हितों की तरफदारी की तो उसे व्यापक जनसहानुभूति मिली। और जब भी किसी अंतरराष्ट्रीय पैंतरे वश हमारे नैसर्गिक क्षेत्रीय हितों के प्रतिकूल गए तो न केवल फंसे, बल्कि वैश्विक किरकिरी भी झेलनी पड़ी। क्योंकि हमारी शाश्वत गुटनिरपेक्षता की नीति और अमन-चैन वाले स्वभाव की पूरी दुनिया कायल रही है और रहेगी भी। तभी तो भारत कभी विश्व गुरु समझा गया तो कभी सोने की चिड़ियाँ।

कहना न होगा कि उपर्युक्त दोनों सम्भावनाएं अब भी बलवती हैं। इसलिये सार्क, आसियान और अरब मुल्कों के मद्देनजर चीन अपनी ओछी हरकतों, विशेषकर भारत विरोधी चाल से बाज आये, और सिर्फ इतना याद रखे कि कभी अफगानिस्तान में सोवियत संघ (अब रूस) और पाकिस्तान में अमेरिका की जो फजीहत हुई है, आगे मालदीव व श्रीलंका में उसकी होने की नौबत न आ जाये। क्योंकि यहां भारतीय हित स्पष्ट हैं। इसलिये भारत को चाहिए कि वह बदली हुई वैश्विक परिस्थितियों में चीन को इस बात का एहसास करा दे कि कभी पंचशील के  सिद्धांतों और ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ की भूलभुलैया में फंसकर 1962 की चोट खाया गुटनिरपेक्ष भारत अब पूरी तरह से दबंग भारत में तब्दील हो चुका है। अब वह शांति मंत्र पाठी हिंदुस्तान नहीं रहा, बल्कि तुम जैसे दगाबाज दोस्तों की खतरनाक फ़ितरतों से हरवक्त निबटने वाला हथियार प्रेमी इंडिया बन चुका है।

इस बात में कोई दो राय नहीं कि अब अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां भी चीन के प्रतिकूल, लेकिन भारत के पक्ष में बन चुकी हैं। इसलिये भारतीय नेतृत्व को अपने दूरगामी हितों के मद्देनजर उसे भुनाने में कोई कोताही नहीं बरतनी चाहिए। क्योंकि सार्क, आसियान और अरब देशों से जुड़े किसी भी मसले पर भारत की भूमिका निर्विवाद रूप से बड़े भाई की है जिसे निभाने में  भारतीय नेतृत्व को कभी भी हिचकना नहीं चाहिए। क्योंकि यदि इस ‘कूटनीतिक प्रेम त्रिकोण’ को साधने में भारतीय नेतृत्व कामयाब हो जाएगा तो निःसंदेह उसका भविष्य उज्ज्वल होगा। लेकिन यदि चीन के मुकाबले अदम्य साहस और सैन्य उत्साह प्रदर्शित करने में भारत यदि चूक जाएगा तो भविष्य में वह चीन के चक्रव्यूह में फंसकर तड़पते रहने को अभिशप्त होगा जिसे कोई भारतीय पसंद नहीं करेगा।

इस बात में कोई दो राय नहीं कि सार्क देशों को अपनी किसी भी समस्या के समाधान के लिये भारत के नेतृत्व में, उससे न निबटे तो आसियान और अरब देशों के साथ मिल बैठकर निबटाना चाहिए। यदि तब भी कोई वाजिब निष्कर्ष न निकले तो सुदूर पूर्व या पश्चिमी देशों के साथ मिल-जुलकर उसके समुचित हल का प्रयत्न करना चाहिए। लेकिन चीन जैसे महत्वाकांक्षी व मतलबी देश के ऊपर कतई भरोसा नहीं करना चाहिए, क्योंकि उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि धूमिल है। सुकून की बात है कि भारतीय नेतृत्व न केवल इसे समझ रहा है, बल्कि उसी के अनुरूप अपना एजेंडा और तेवर दोनों बदल रहा है, जिससे अन्य साथी देश भी लाभान्वित होंगे ही। इसलिये वैश्विक शांति के लिहाज से बेहतर होगा कि चीन उसमें ज्यादा दिलचस्पी ही नहीं लें, क्योंकि वह यदि अधिक रुचि लेगा, तो अमेरिका भी उसमें कूदेगा ही। और शायद इसलिये ही वह मालदीव में भी कूदा है।

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