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आपसी रिश्तों में नहीं फंसने दिया खालिस्तानी पेंच

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आलेख: कमलेश पांडे, वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार। कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रीडियू की भारत यात्रा के दौरान जिस तरह से उनके खालिस्तान समर्थक रुख की चारों ओर तीखी आलोचना हुई, वह निराधार नहीं है। क्योंकि उनके मुम्बई कार्यक्रम में सजायाफ्ता खालिस्तानी आतंकी जसपाल अटवाल की मौजूदगी ही कुछेक बातों की चुगली की है। हालांकि पीएम ट्रीडियू ने अटवाल को अपने रात्रि भोज में आमंत्रित किये जाने को महज प्रशासनिक चूक बताकर अपनी लाज बचाने की कोशिश की। लेकिन, भारत ने भी उनकी बातों पर सहसा विश्वास नहीं किया। यही वजह है कि द्विपक्षीय बातचीत में भारत ने बेहद मजबूती से अपना पक्ष रखा, जबकि कनाडा ने भी समझदारी पूर्वक भारत के प्रति सकारात्मक रुख दिखाया। जिससे दोनों देशों के आपसी रिश्ते पटरी पर आ गए।

खास बात यह है कि कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रीडियू की पत्नी सोफिया ट्रीडियू और उनके एक मंत्री अमरजीत सोही के साथ लिए गए अलग-अलग छायाचित्रों में सजायाफ्ता आतंकी जसपाल अटवाल की जो तस्वीर सामने आई है, उससे इनके अंडरवर्ल्ड के साथ मधुर रिश्तों का पता चलता है। यही नहीं, कनाडा उच्चायोग के रात्रिभोज के आमंत्रित लोगों की सूची में भी उसका नाम होने से कनाडा सरकार की लापरवाही या फिर मिलीभगत का खुलासा हुआ, जिस पर भारत ने कड़ा एतराज  जताया। फलस्वरूप रात्रि भोज को ही रद्द करना पड़ा।

सच कहा जाए तो कनाडा की राजनीति में सिख समुदाय का वोट बैंक अहम मायने रखता है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रीडियू भी खालिस्तान आंदोलन के करीब रहे हैं। उनके कई मंत्रिगण भी इस आंदोलन के बेहद करीब बताए जाते हैं। उनकी लिबरल पार्टी भी कनाडाई सिखों के वोट बैंक और उनकी फंडिंग पर ही आश्रित रही है। इसीलिए प्रधानमंत्री बनने के बाद जस्टिन ट्रीडियू भी खालिस्तानियों के प्रभुत्व वाले खालसा दिवस समारोह में शामिल हुए थे, जबकि उनके पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री भी इस समारोह में जाने से बचते रहे हैं।

इन बातों से स्पष्ट है कि दुनियावी राजनीति में हमेशा दो जोड़ दो बराबर चार नहीं होता। प्रायः इसमें सब कुछ सही भी नहीं होता और न ही बहुत कुछ अनायास होता है। इसलिये भारत और कनाडा के द्विपक्षीय रिश्तों में खालिस्तान की वजह से जो समसामयिक खटास उभरकर सामने आई, उससे दोनों देशों के बीच में भले ही कुछेक विवाद गहराए, जिससे होने वाले नुकसान की भरपाई करने की पूरी कोशिश कनाडा नेतृत्व ने बिना समय गंवाए की और भारत का विश्वास जीतने में  कामयाब हो गया।

भारत की रणनीतिक बेरुखी और कनाडा की दिली बेकरारी का नतीजा यह निकला कि दोनों देश आतंकवाद तथा चरमपंथ के खिलाफ परस्पर सहयोग के लिये न केवल राजी हो गए, बल्कि इस बाबत एक फ्रेम वर्क पर काम करने की अपनी अपनी सहमति भी दी है। इसमें खालिस्तानी आतंकी समूहों का नाम भी शामिल किया गया है। बता दें कि अब दोनों देश बब्बर खालसा इंटरनेशनल, इंटरनेशनल सिख यूथ फेडरेशन, अलकायदा, हक्कानी नेटवर्क, लश्कर ए तैय्यबा, जैश ए मोहम्मद जैसे आतंकी संगठनों से पैदा होने वाले खतरों से निपटने और उसका खत्मा करने के लिये एक-दूसरे से मिलकर काम करेंगे। इसके अलावा, दोनों देशों के बीच उनकी कानून प्रवर्तन एजेंसियों और नीति नियंताओं के बीच सहमति बनाने पर भी जोर दिया गया है।

यही नहीं, भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने द्विपक्षीय बातचीत के दौरान कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रीडियू से स्पष्ट कर दिया है कि भारत की सम्प्रभुता, एकता और अखंडता को चुनौती देने वाले खालिस्तानी समूहों को कतई बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। इसलिये राजनीतिक मंशा के लिये धर्म का दुरुपयोग करने और अलगाववाद को बढ़ावा देने वालों के लिये हमारे बीच में कोई स्थान नहीं होना चाहिए। यही वजह है कि भारत के कड़े रुख के कारण ही दोनों देशों के बीच एनएसए स्तर की वार्ता में आतंकरोधी फ्रेमवर्क को न केवल मंजूरी दी गई, बल्कि इसमें खालिस्तानी आतंकी संगठनों के खिलाफ साझा कार्रवाई की बात करते हुए निरन्तर एक-दूसरे के सम्पर्क में बने रहने की बात भी कही गई है।

विशेष बात यह है कि कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रीडियू ने एक मौके पर दो टूक कहा कि यह यात्रा करीबी रिश्ते और अतुलनीय अवसरों से जुड़ी है। इसलिये यह हाथ मिलाने और तस्वीरें खिंचवाने के अवसर तलाशने की यात्रा नहीं है। यह राजनीतिक समीकरणों से परे जाकर लोगों से रिश्ता बनाने का समय है और वह यही कर रहे हैं। क्योंकि सांस्कृतिक और आर्थिक रिश्ते आगे बढ़ाने का वह इसी को बड़ा आधार मानते हैं। देखा जाये तो दोनों देशों में जो समझौते हुए हैं, उससे यह प्रतीत होता है कि प्रोटोकॉल तोड़कर भले ही उनका कोई भव्य स्वागत भारत में नहीं हुआ, लेकिन जिस मकसद से वह यहां आए थे, उसमें उन्हें काफी कामयाबी मिली है।

दोनों देशों के आपसी समझौतों से जाहिर है कि भारत ने कनाडा के साथ आपसी संबंधों को हमेशा ही उच्च प्राथमिकता दी है, क्योंकि लोकतंत्र, बहुलतावाद और कानून का राज दोनों देशों को एक दूसरे से बांधता है। उनमें निवेश, शिक्षा, ऊर्जा और सम्पर्कता के क्षेत्रों में भी आपसी सहयोग से महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। भारत-कनाडा की आर्थिक साझेदारी में भी अपार क्षमता मौजूद है। चूँकि, भारतीय अर्थव्यवस्था तेज गति से बढ़ रही है। इसलिये यहां भी कनाडा के निवेश के लायक नए अवसरों के द्वार खुल रहे हैं।

यही वजह है कि भारत ने कनाडा की कंपनियों को मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, स्मार्ट सिटी, संरचना विकास और स्किल इंडिया जैसी बहुउद्देशीय पहलों में साझेदारी करने के लिए आमंत्रित किया है ताकि दोनों देश अपने द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ाने और उसमें विविधता लाने की दिशा में मिल जुलकर काम कर सकें। कहना न होगा कि व्यापार और निवेश से लेकर ऊर्जा तक, विज्ञान और इनोवेशन से लेकर शिक्षा और कौशल विकास तक, सागर से लेकर अंतरिक्ष तक, हर सेक्टर में भारत और कनाडा एक साथ काम कर सकते हैं।

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